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राजस्थान का रण- जयपुर से अजमेर: चमचमाते हाईवे पर टाट के पैबंद सा गांव

हाईवे के पास चंद गज जमीन हो तो लोग करोड़ों में खेलते हैं, लेकिन हमारा तो यहां पूरा गांव बसा है। ये देख लो, हाईवे दिखता है, सड़क पर एक कंकड़ नहीं और मैं खड़ी हूं यहां खड्डे बने हुए हैं। गांव में अस्पताल की व्यवस्था नहीं है। एक्सीडेंट हो जाए या डिलीवरी करवानी हो तो तुरंत किशनगढ या जयपुर लेकर जाना पड़ता है।

हम हाइवे के पास है लेकिन ये हाईवे हमें चिढ़ाता है। दांतरी गांव की रहने वाली संतोष का गुस्सा मेरे सवालों पर फूट पड़ा। ये गुस्सा वाजिब भी है क्योंकि जयपुर-अजमेर हाईवे पर दूदू से आगे है दांतरी ग्राम पंचायत मुख्यालय।

करीब पन्द्रह सौ लोगों की आबादी वाले इस गांव को देखें तो लगता है कि किशनगढ़ और जयपुर के रास्ते में चले जा रहे विकास ने इस गांव की तरफ झांका तक नहीं। इस ग्राम पंचायत में तीन-चार गांव और आते हैं लेकिन न दांतरी और न ही आस-पास के गांवों की समस्याएं कम हुई। गांव में जाते ही हमें मिली फसल बर्बादी की दस्तान, इस साल पानी ठीक से नहीं बरसा।

इसीलिए बाजरा, मूंग और ज्वार की करीब 70 फीसदी फसल बर्बाद हो गई। कोई गिरदावरी नहीं हो रही, न कोई नेता पूछने आया। बाजरे के खराब सिट्टे दिखाते हुए यहां के किसान रामकरण खींची ने कहा कि जितना बाजरा निकल पाएगा, उसी की कोशिश में सभी किसान लगे हुए हैं। इस बार हजार, ग्यारह सौ से ज्यादा का भाव नहीं। वो भी तब जब दूदू और किशनगढ़ कीं मंडियां भाव खोलेंगी। लादूराम का कहना है बीपीएल में नाम ही नहीं जुड़ पा रहा और न ही पेंशन मिल रही है।

मुख्यालय से आगे चले तो मेहर गांव में बालूराम मिले। बालूराम को शिकायत है कि गांव की सड़क पर कीचड़ फैला रहता है, ग्राम गौरव पथ के बारे में उन्हें कुछ नहीं पता। कहने को तो बीसलपुर योजना में ये गांव शामिल है लेकिन अभी तक पानी नहीं आया। राजनीति को लेकर वो कहते हैं कि तीस साल से वोट डाल रहा हूं लेकिन सब आते हैं, वोट लेने के बाद कोई नहीं मिलता।

70 साल के छीतरजी का कहना है कि जाति का हो,परजाति का हो, किसी भी गांव का हो। इस बार अच्छा नेता चाहिए। गांव के युवा नरेश राजनीतिक रूप से जागरूक हैं। पार्टी विशेष की पैरवी भी करते दिखे लेकिन कुछ कुरेदा तो कह गए कि नेता पढ़ा-लिखा और संवेदनशील होना चाहिए। गांव में दहेज जैसी कुरीति है और गांव की शुरुआत ही शराब की दुकान से हो रही है। ये स्थिति बदलनी चाहिए। दांतरी ग्राम पंचायत के गांवों में बिजली की बड़ी समस्या है। शाम होते ही बिजली गुल हो जाती है। गांव में हमें ललिता देवी मिली, उनकी तरह गांव में लड़कियां बारहवीं तक ही पढ़ी लिखी है।

क्योंकि इसके बाद कॉलेज के लिए 25 किलोमीटर दूर किशनगढ़ या सांभर जाना पड़ता है। गांव का सरकारी स्कूल हाईवे के पार बना हुआ है। छोटे बच्चों को स्कूल भेजने में डर लगता है, गाडिय़ां बहुत तेज चलती हैं, पिछले महीने ही तेज रफ्तार वाहन की चपेट में आने से गांव के एक आदमी की मौत हो गई थी।

बच्चों को स्कूल भेजें या खेत में जाकर काम करें ? ललिता कह रही है कि पार्टीबाजी होती रहती है लेकिन हमारे काम नहीं। इसी गांव में जुमा मोहम्मद बताते हैं कि उनकी बिरादरी के 15-20 मकान है।

बच्चे स्कूल जाते हैं लेकिन सालों से किसी भी बच्चे को छात्रवृत्ति नहीं मिली। राम मंदिर, ट्रिपल तलाक पर सवाल पूछा तो कहा कि सरकार को धर्म के मामले में दखल नहीं देना चाहिए। सबको अपने-अपने समाज,बिरादरी की बुराइयों को मिलकर खत्म करना चाहिए। विकास होगा, रोजगार होगा तो सब बुराई खत्म हो जाएगी।

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