गोबर की खाद से संतुलित
प्रतापगढ़ जिले में गत वर्षों से उत्पादन बढ़ाने के लिए जहां रसायनिक उर्वरक और कीटनाशक का उपयोग बढ़ता जा रहा है।जिससे मिट्टी की उर्वरकता तो बढ़ रही है, लेकिन मिट्टी में जीवाणु की संख्या लगातार कम होती जा रही है। जिससे उत्पादकता नहीं बढ़ रही है, वहीं फसलें और खाद्यान्न भी अपेक्षाकृत कमजोर होता जा रहा है।इसे देखते हुए किसानों को बुवाई से पहले और सिंचाई के दौरान जैव उर्वरक के उपयोग की सलाह कृषि वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों द्वारा दी जा रही है।जिससे मिट्टी की सेहत में सुधार होगा और फसलें स्वस्थ्य रहेगी।
गौरतलब है कि पिछले कुछ वर्षों से खेतों में गोबर की खाद डालने में कमी हो गई है, वहीं रासायनिक खाद और कीटनाशकों का उपयोग बढ़ गया है। इससे उर्वरकता तो बढ़ती जा रही है, लेकिन इस खाद का पूरा फायदा फसल तक नहीं पहुंच पा रहा है।इसका कारण मिट्टी में जीवाणु की संख्या में कमी है।
पांच ग्राम मिट्टी में मात्र 50-60 हजार जीवाणु
कृषि आंकड़ों के अनुसार खेत की उपजाऊ मिट्टी में प्रति पांच ग्राम में ढाई से तीन लाख जीवाणु होने चाहिए। लेकिन कीटनाशक और रासायनिक खाद के लगातार उपयोग के कारण वर्तमान में खेतों में यह संख्या मात्र 50-60 हजार ही रह गई है। इससे उत्पादकता घटती जा रही है।
यह होते है मिट्टी में जीवाणु
मिट्टी में जीवाणु महीन होते है। जो नग्न आंखों से नहीं दिखते है। लेकिन पौधों के पोषण में इनकी महत्ता काफी अधिक होते है।मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ जो गोबर की खाद या फसलों के अवशेष प्राप्त होते है। वह जीवाणु का भोजन होता है। पोषक तत्वों को जीवाणु ही पौधे तक पहुंचाते है।
तरल जैव उर्वरक का उपयोग
बुवाई से पहले तरल जैव उर्वरक का उपयोग किए जाने पर काफी लाभ होता है।इसक उपयोग बीज उपचार के दौरान, सिंचाई के दौरान और मृदा उपचार से किया जा सकता है। इसके लिए निर्धारित मात्रा में उपयोग कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार किया जा सकता है।





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