जीणमाता. यह आस्था का केन्द्र है ....जहां प्रतिवर्ष उमड़ता है लाखों श्रद्धालुओं का सैलाब। इस दर पर मांगी गई मनौतियां पूर्ण होने पर जात-जड़ूला ,सवामणी,ध्वजा निशान के साथ-साथ आस्था को चिरस्थाई बनाने के लिए यहां निभाई जाती थी तिब्बारा (आवास) बनाने की अनूठी परम्परा। जी हां हम बात कर रहे प्रसिद्ध शक्तिपीठ जीणधाम की,जहां तिब्बारा बनाने की परम्परा के चलते भक्तों ने मंदिर श्रेत्र में जहां जगह दिखी वहीं अपने पुरखों की स्मृति में तिब्बारे या कमरे सार्वजनिक उपयोग हेतु बनवाए।
परिणाम स्वरूप पिछले 90 वर्षों में जीणधाम में भक्तों ने 1100 से अधिक खुले तिब्बारे या कमरें बनवा डाले। मैदान,रास्ता,जंगल यहां तक की पहाड़ पर भी कमरें बनाने का सिलसिला चलता रहा लेकिन योजनाबद्ध निर्माण व नियंत्रण के अभाव में आवास बनाने की यह परम्परा बेतरीब हो गई। दो दशक पहले वन विभाग यहां सक्रिय हुआ और जीणमाता मंदिर श्रेत्र वन भूमी में होने के कारण वन विभाग ने किसी प्रकार के निर्माण यहां तक की इन तिब्बारों की मरम्मत तक पर रोक लगा दी, जिसके कारण वर्षों पूर्व बने सैकड़ों तिब्बारे जर्जर हो गए।
आवास व्यवस्था के समुचित प्रबंध नही होने के कारण अधिकांश श्रद्धालु जीणमाता रात्रि विश्राम से कतराते है। और खाटूश्याम,सालासर या अन्य जगह जाकर रूकते है। इस संबन्ध में वन विभाग का कहना है कि वन संरक्षण अधिनियम 1980 के तहत किसी प्रकार का गैर वानिकी कार्य करने की इजाजत नही दी जा सकती है।
बदहाली से जूझते
जीणधाम में आवास व्यवस्था का दूसरा पहलु भी है जहां पुराने जर्जर भवनों के जीर्णोद्धार में बाधक बन रहा वन विभाग भी मेहरबानी दिखा रहा है और प्रशासन के अन्य विभाग भी, जिसके कारण वन भूमी में भी सभी सुविधाओं से युक्त 10-12 कथित धर्मशालाओं का निर्माण हो गया,ना जमीन का पैसा लगा ना ही किसी अनुमति की आवश्यकता बस सेंटिग के खेल से जैसे-तैसे विशाल भवनों का निर्माण हो गया अनेक जगह तिब्बारे को तोड़ कर विशाल धर्मशाला का रूप दिया गया।





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