क्या है मानसिक रोग का अलार्म
- अंधविश्वास की क्रियाओं में संलग्न
- बार-बार एक ही तरह के विचार
- ज्यादा समय अकेले बिताना
- अनावश्यक दबाव अधिक समय तक झेलना
बाड़मेर . मानसिक स्वास्थ्य उतना ही महत्वपूर्ण है,जितना सामान्य स्वास्थ्य है। अधिकांश लोग इस बारे में जागरूक नहीं होते हैं। ऐसे में बाद में अवसाद की स्थिति पैदा हो जाती है। हम जिस सामान्य नियम के साथ चलते हुए बुखार व खांसी आने पर चिकित्सक से जांच करवा कर परामर्श लेते हैं। उसी तरह मानसिक स्वास्थ्य के बारे में जागरूक बनाना होगा। मानसिक स्वास्थ्य को लेकर हमारा शरीर वार्निंग अलार्म जरूर बजाता है, लेकिन अधिकांश लोग उसे अनदेखा करते हैं।
थार में जन जागरूकता लाना जरूरी
मनोरोग चिकित्सकों का मानना है कि इस अलार्म को सुनते हुए चिकित्सक को दिखाना चाहिए। मानसिक रोगों को लेकर झिझक को तोडऩा होगा। वर्तमान में युवाओं में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर परेशानिया बढ़ रही है। इसे लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी चिंता जाहिर की है। शिक्षा को लेकर युवाओं पर भयंकर दबाव एक मुख्य कारण सामने आया है। इसके चलते युवा अवसाद में चले जाते हैं। पूरी देखरेख और अभिभावकों से दूरी रहने पर युवा आत्महत्या तक कर लेते हैं। इस पर रोक के लिए युवाओं को बदलते समय के साथ उन्हें अपना क्षेत्र खुद चुनने देने चाहिए। विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसा करने पर युवा दबाव मुक्त रहेगा तो निश्चित ही उसका विकास होगा।
इसलिए बढ़ रहे मनोविकार के मामले
मोबाइल और टीवी पर अधिक समय और संयुक्त परिवार खत्म होने से मनोरोग के मामले बढ़ते जा रहे हैं। अधिकांश समय लोगों का समय मोबाइल पर उपयोग या टीवी के सामने बीतता है। बातचीत में कमी आई है। इससे समस्याएं घटने की बजाय बढ़ती जा रही है। जिस पर बात नहीं होती है, इसका परिणाम फिर अवसाद में सामने आने लगा है।
सोशल मीडिया नहीं कर दे बीमार
किसी भी चीज का एडिक्ट होना एक तरह का मानसिक विकार है। आजकल सोशल मीडिया से युवाओं का दिनभर जुड़ा रहना घातक साबित हो रहा है। मेट्रो सिटी में मनोरोग विशेषज्ञों के पास रोजाना 10-15 मामले युवाओं के आते हैं, जिसमें सोशल एडिक्ट होते हैं। अधिक देर तक इन प्लेटफार्म पर रहने के कारण इनकी स्थिति बीमारों जैसी हो गई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर युवाओं के अधिक समय तक रहने पर चिंता जाहिर की है। इसे भी एक नशे का प्रकार माना जाने लगा है।
1992 से मनाया जाता है मानसिक स्वास्थ्य दिवस
इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ मेंटल हेल्थ की ओर से पहली बार 1992 में मानसिक स्वास्थ्य दिवस मनाया गया था। इसके बाद यह हर साल 10 अक्टूबर को मनाया जाता है। इसका उद्देश्य यह है कि लोगों में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़े और मानसिक रोगों को लेकर झिझक खत्म हो। इस बार इस दिवस की थीम 'युवाओं का बदलते समय में मानसिक स्वास्थ्यÓ रखी गई है। जिसमें सर्वाधिक युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर फोकस किया गया है।
ठीक हो सकता है रोगी : ये है उदाहरण
धो रीमन्ना के कुंडारा फांटा की राधा देवी (बदला हुआ नाम) का मानसिक रोग इतना बढ़ गया कि उन्हें लोहे की सांकल से बांधकर रखना पड़ता था। उनका इलाज यहां मनोविकार केंद्र में करवाया गया। इस साल फरवरी में यहां सात दिन भर्ती रखकर उपचार किया गया। आज वह सामान्य जीवन बीता रही है। केंद्र के प्रभारी डॉ. ओपी डूडी ने बताया कि मानसिक रोगी का इलाज अस्पताल में करवाएं न कि अंधविश्वास के फेर में फंसे। इससे आर्थिक नुकसान भी होता है और बीमार की स्थिति और खराब हो जाती है।
जागरूकता का अभाव
&थार में मनोरागी में महिलाएं अधिक है। वहीं युवाओं में ड्रग एडिक्ट हैं। परिवार से दूर रहने व जागरूकता के अभाव के कारण अवसाद की स्थिति बन जाती है। अंधविश्वास के कारण चिकित्सक से पहले झाड़-फूंक करवाने के चक्कर में ठीक होने की बजाय ज्यादा बीमार हो जाते हैं।
डॉ. ओपी डूडी, मनारोग विशेषज्ञ, मनोविकार केंद्र, राजकीय चिकित्सालय, बाड़मेर





No comments:
Post a Comment