अजमेर.
एक पुराने कांग्रेसी हैं रामबाबू शुभम । सातवें आठवें दशक तक यह नाम काफी चर्चित था। शहर के अधिकांश पुराने राजनीतिज्ञों और लोगों के लिए यह नाम काफी जाना पहचाना रहा है। कांग्रेस की प्रत्येक गतिविधि में रामबाबू शुभम काफी सक्रिय भूमिका निभाते थे। बड़ा नेता बनने की कभी महत्वकांक्षा नहीं पाली।
पार्टी के सच्चे सिपाही के तौर पर जो जिम्मेदारी दी गई उन्होने पूरे मनोयोग से निभाया। कांगे्रस ने भी उनकी लगन और ईमानदारी को गंभीरता से लिया और उनकी सेवा के बदले तीन बार विधानसभा टिकट से नवाजा। लेकिन राजनीति में किस्मत का बड़ा योगदान रहता है। उनके नसीब में विधायक बनना नहीं था सो तीनों बार हार का सामना करना पड़ा।
आज राजनीत के उनके सफर और टिकट मिलने के संयोग की बात उन्हीं की जुबानी। पत्रिका से बातचीत करते हुए उन्होने बताया कि बात है वर्ष 1977 की। विधानसभा चुनाव के लिए नामांकन भरे जा रहे थे। उन्हीं दिनों मैं अपने भांजे की शादी में मायरा भरने हरियाणा के भिवानी गया हुआ था।
उस समय मै पार्षद था। मैने न तो टिकट की दावेदारी की थी और न ही मिलने की उम्मीद ही थी। शादी से जिस दिन वापिस अजमेर लौटे उसके दूसरे दिन विधानसभा चुनाव के लिए नामांकन भरने का अंतिम दिन था। रात को घर पर पत्रों के साथ एक विशेष लिफाफा भीनजर आया । खोला तो उसमें पार्टी का टिकट मिला। सिंबल मिला तो घर पर अचानक अफरा तफरी बच गई।
रात भर नामांकन भरने के लिए जरुरी दस्तावेज संभाले और दूसरे दिन जाकर नामांकन दाखिल कर दिया। उस समय कांग्रेस का चुनाव चिन्ह गाय और बछड़ा हुआ करता था। विधानसभा चुनाव में उनके सामने थे जनता दल के कल्याणसिंह।
तीनों बार क अक्षर से हारे
शुभम बताते हैं कि उन्होने 1980 और 1990 में भी चुनाव लड़ा । तीनों बार उनके प्रतिद्विद्वदी उम्मीदवारों के नाम क अक्षर से प्रारंभ थे। 1977 में कल्याण सिंह, 1980 वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष कैलाश मेघवाल और 1990 में किशन सोनगरा। किस्मत की बात देखिए तीनों बार हार का सामना करना पड़ा।
साइकिल पर किया प्रचार
शुरू आत के आठ दिन साइकिल पर प्रचार किया। क्षेत्र के सभी प्रमुख लोगों से व्यक्तिगत रुप से मिलकर समर्थन मांगा। बीड़ी उद्योगपति शंकर सिंह भाटी सहित अधिकांश प्रमुख लोगों ने उनका साथ भी दिया। प्रचार के लिए समय कम था और क्षेत्र का दायरा भी बड़ा था। लिहाजा एक गाड़ी किराए पर ली। उससे क्षेत्र में प्रचार किया। सुबह 8 बजे प्रचार के लिए निकलता । वापिस लौटते रात के 9 बज जाते थे। बीच में मौका मिलता तो खाना खाने घर आ जाता वरना कार्यकर्ताओं के घर पर ही खा लिया करता था। देर रात तक कार्यकर्ताओं से दूसरे दिन के कार्यक्रम तय करता था।
चुनाव का माहौल था सौहार्दपूर्ण
उस समय कार्यकर्ता तन मन धन से प्रचार में लगते थे। वे ही जी जान लगाकर मतदाताओ की सूची और पर्चियां बनाते थे। दूसरे दिन घर घर जाकर वितरित भी कर देते थे। बैनर पोस्टर का चलन नहीं था । दीवारों पर प्रत्याशी और पार्टी का नाम लिखकर प्रचार किया जाता था। अच्छी बात यह थी कि प्रचार के दौरान किसी भी प्रत्याशी ने दूसरे पर किसी तरह की छींटाकशी नहीं की। प्रचार के बीच अक्सर मुलाकात हो जाती थी । सौहार्दपूर्वक एक दूसरे का अभिवादन करते और आगे निकल जाते। बहरहाल 1977 का वो चुनाव मेरे लिए सबसे यादगार है।





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