राजसमंद. बोए जाते हैं बेटे, उग जाती हैं बेटियां... खाद-पानी देते बेटों को और लहलहाती हैं बेटियां। इन पंक्तियों के जरिये सिंदेसर कलां की पूर्व सरपंच तारा बेगम ने वर्तमान हालातों में कन्या जन्म से लेकर उसके शारीरिक-मानसिक विकास और मां बनने तक की प्रक्रिया में चुनौतीपूर्णहालातों को रेखांकित, तो बाकी विशेषज्ञों ने सरकारी योजनाओं की कमी-खामी और अच्छे पहलुओं पर भी बेबाकी से विचार रखे।
मौका था सोमवार को नगर परिषद सभागार में राजस्थान पत्रिका और जतन संस्था के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित मातृत्व सुरक्षा विषयक टॉक शो का। पत्रिका के समाचार अभियान ‘मां को मां रहने दो’ के केन्द्रीय विषय पर हुईचर्चामें जतन संस्थान की ओर से राजस्थान और राजसमंद जिले में लिंगानुपात, ग्रामीण और शहरी वर्ग की महिला के शारीरिक, आर्थिक, शैक्षिक, सामाजिक विकास के तमाम पहलुओं पर शोधपूर्ण आंकड़े पेश करते हुए गहन चर्चा की गई।
जतन संस्था के प्रोग्राम मैनेजर राजदीप सिंह ने पीपीटी के जरिये बताया कि जन्म की प्रक्रिया से नहीं, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक वातावरण से स्त्री-पुरुष का भेद शुरू होता है।
मूलरूप से समाज जिम्मेदार है। वर्ष 2008 में जतन द्वारा कराए अध्ययन की रिपोर्ट पेश की गई। सहभागियों ने बताया कि कहीं-कहीं महिला स्वयं की स्थिति के लिए जिम्मेदार है। खुद जागरूक नहीं है। समाज पुरुष प्रधान रहा है। स्त्री को सम्पत्ति मिलने के नाम पर उसे दहेज देकर अलग कर दिया जाता है। यहां तक कि अपनी तनख्वाह भी उसे अपने घर पर देनी होती है। वर्धिनी पुरोहित ने कहा कि गर्भवती महिला के टीकाकरण पर सरकार अब भी पूरी गम्भीरता से काम नहीं कर रही है। स्त्री को सर्वप्रथम अपनी खुद की इज्जत करनी होगी। उन्होंने यह भी अफसोस जताया कि नौ दिन माता को पूजते हैं, मगर घर और समाज की दुर्गा को नहीं पूजते हैं। प्रोग्राम मैनेजर भूपेन ने देश, राज्य, संभाग व राजसमन्द जिले के आंकड़े पेश करते हुए कहा कि राजसमन्द बाल विवाह के मामले में प्रदेश में दूसरे स्थान पर है। यहां बाल लिंगानुपात सबसे कम है। हर दूसरी लडृकी एनीमिक है। एक सहभागी ने अनुभव साझा किए कि ग्रामीण क्षेत्र में कतिपय समाज में गर्भवती महिलाओं की दयनीय स्थिति हो जाती है। चिकित्सा और स्वाथ्यकर्मी तक का उनके प्रति नजरिया ठीक नहीं है। समाजसेवी जे.के. डांगी ने कहा कि महिलाओं ने खुद को दूसरों के हाथों में सौंपकर कमजोर कर दिया। उनके पोषण, सेहत और शिक्षा के स्तर पर योजनाएं बनाकर परिणामदायी क्रियान्वयन करने की जरूरत है।
बाल विवाह रोकना जरूरी
खुले मंच में सभी सहभागियों ने कहा कि बाल विवाह रोकथाम पर काम हो। संस्थान के उप निदेशक रणवीर सिंह ने बताया कि ग्राम स्तर पर गोद भराई परम्परा को मजबूत किया जाए, ताकि बेटे की आकांक्षा में बार-बार बेटियां पैदा किए जा रहे परिवारों पर सामाजिक मर्यादा का भी दबाव बन सके। महिला नसबंदी की बजाय पुरुष नसबंदी पर भी जोर दें। डॉ. अनिल जैन ने कहा कि सरकार ने काफी कार्यक्रम चला रखे हैं। प्रचार-प्रसार भी हो रहा है, लेकिन जमीनी स्तर पर स्वयंसेवी संस्थाओं की भी ज्यादा जरुरत है। डॉ. विजय खिलनानी ने कुम्भलगढ़, खमनोर और राजसमंद के आदिवासी इलाकों में महिलाओं और बच्चों में कुपोषण के चिंताजनक हालातों और मौजूदा स्वास्थ्य सेवाओं की समीक्षा की। उन्होंने कहा कि कम से कम सात दिन या एक माह में डॉक्टर ग्राम स्तर पर विजिट करे और रिपोर्ट बनाकर उस पर काम किया जाए। कार्यालय प्रभारी प्रदीप प्रधान ने आभार जताया।
इन्होंने भी रखे विचार
जिला सन्दर्भ दल के भंवरलाल वागरेचा, भगवत शर्मा, पुष्पा कर्नावट, पूर्व बाल कल्याण समिति अध्यक्ष हरकलाल बापना, एडवोकेट सीमा जैन, महिला मंच की रेहाना खान, पुष्पा सिंघवी, आरएमआरएस पदाधिकारी कन्हैयालाल स्वर्णकार, वीरेंद्र सिंह, कार्यक्रम समन्वयक अंजू कुंवर, विश्वप्रताप सिंह, पोषण विशेषज्ञ प्रियंका, चाइल्ड लाइन परियोजना से संजय व गंगाराम ने भी सुझाव दिए।





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