चूरू. बच्चों के सपनों में रंग भरने के लिए गांव के खेत-खलिहान-खेती छोड़ परदेश गए बेगराज को विदेश की सरजमीं ज्यादा दिन रास नहीं आई। कुछ समय जैसे-तैसे गुजारे भी। मगर जब मन नहीं माना तो वापस लौट आए अपने गांव में। फिर यहीं के होकर रह गए। पिता समुंदर सिंह के साथ पारंपरिक खेती में हाथ बंटाने लगे।
राजस्थान के चूरू जिले के तारानगर में इंदिरा गांधी नहर के पानी से जुड़े अपने 18 बीघा खेत में ग्वार, मूंग, मोठ, बाजरा की खेती करने लगे। पारंपरिक खेती करते-करते बेगराज ने फलों का उत्पादन लेने की ठानी और आज सफलता पूर्वक न केवल इनकी खेती कर रहे हैं। बल्कि आयुर्वेदिक औषधी सतावरी की पैदावार लेने के लिए पौधे लग चुके हैं।
इसके अलावा गाय-भैंस पालकर पशुपालन भी करते हैं। गाय-भैंस की खरीद-फरोख्त से भी अपनी आजीविका मजबूत बना रहे हैं। दिन रात की मेहनत का प्रतिफल है कि आज इनके खेत में कीनू, अनार व मौसमी के पेड़-पौधे लहलहा रहे हैं। ग्वार की फसल खेत में फिलहाल लहलहा रही है। मंूग-मोठ की फसल काटी जा चुकी है।
राजस्थान पत्रिका डॉट कॉम से बातचीत में बेगराज बताते हैं कि विदेश की धरती पर रहकर कमाई तो कर सकते हैं। मगर वतन और परिजनों से दूर रहकर दिल को सुकून नहीं मिलता। आज अपने घर में रहकर अच्छी कमाई करके चैन से रह पा रहा हूं।
विभाग से हो चुके हैं सम्मानित
चूरू जिले के प्रगतिशील किसानों में शामिल बेगराज समय-समय पर सरकार की विभिन्न योजनाओं का लाभ लेते हुए अपने खेत में सुविधाओं का विस्तार करते हैं। कृषि नवाचारों के क्षेत्र में ये कृषि विभाग से 10 हजार रुपए का पुरुस्कार भी ले चुके हैं।
सतावरी से स्वास्थ्य सुधारने की कवायद बेगराज ने पारंपरिक के साथ आयुर्वेदिक औषधियों की खेती शुरू करने की सोची। काफी पूछताछ के बाद सहारनपुर उत्तर प्रदेश से आयुर्वेदिक जड़ीबूंटी सतावरी की सात हजार पौध मंगवाकर लगाई है।
बेगराज बताते हैं कि इनकी पैदावार होने पर ये बड़े औषधालयों में सप्लाई करेंगे। इससे आमदनी भी होगी और आमजन के स्वास्थ्य में सुधार भी होगा।
इन किस्मों के इतने पौधे
बेगराज ने अपने खेत में 250 पौधे किनू, 100 मौसम, 50 अनार व 30 थाई एपल बेरी के पौधे लगा रखे हैं। इसके अलावा दो बीघा में ग्वार पाठा की खेती भी कर रखी है।





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