राजसमंद. अंधविश्वास या रूढ़ीवादी परंपरा के तहत महिलाओं को प्रताडि़त करने पर मीडिया द्वारा उजागर करने के बाद एक बार पुलिस व प्रशासन द्वारा उसे त्वरित राहत दे दी जात है, मगर समाज में वह पुन: स्थापित नहीं हो पाती। सख्त कानून- कायदे होने के बावजूद जमीनी स्तर पर उसकी कोई पालना नहीं होती। ऐसे में कानून के औचित्य पर ही सवाल खड़े हो रहे हैं। जिले में टोने- टोटके से बीमार, तंगहाल लोगों को डरा, धमका कर कई महिलाओं से अमानवीय बर्ताव कतिपय मंदिरों के भोपों व तांत्रिकों द्वारा किए जा रहे हैं, मगर पुलिस व प्रशासन जानते हुए भी मौन क्यो है ? पुलिस, प्रशासनिक की अनदेखी की वजह से पीडि़ता महिलाएं ही नहीं, बल्कि पूरे पूरे परिवार समाज, गांव से बहिष्कृत सी जिन्दगी जी रहे हैं और प्रशासनिक तंत्र जानकर भी अनजान बना हुआ है।
कुछ यही लबोलुआब राजसमन्द जन विकास संस्थान और राजसमन्द महिला मंच की ओर से हुंकार परियोजना के तत अंधविश्वास पर मीडिया और जनप्रतिनिध की संवेदनशीलता पर कार्यशाला में सामने आया। राजस्थान पत्रिका ने अंधविश्वास का मायाजाल अभियान के तहत प्रकाशित खबरों को कार्यशाला में दिखाया गया। संस्थान निदेशक शकुंतला पामेचा ने बताया कि डायना प्रताडऩा व अंधविश्वास समाज के लिए अभिशाप है। क्योंकि वर्ष 2015 में कानून बन गया। फिर भी न तो पुलिस द्वारा इस एक्ट में प्रकरण दर्ज किए जा रहे हैं और न ही कानून के मुताबिक न्याय व आर्थिक मदद मिल पा रही है। संस्थान की संगीता चौधरी ने डायन कानून के बारे में विस्तृत जानकारी दी। काउंसलर प्रेक्षा जैन ने डायन संबंधी एक एक केस के साथ उसकी वर्तमान स्थिति बताई, तो हर किसी के मुंह से आह निकल गई। इस दौरान बंशीलाल पालीवाल, गीता कुंवर, कैलाश कुंवर, जमना, संगीता चौधरी, लता खटीक, ललिता शर्मा, शारदा खटीक, यशोदा सोनी, शबाना परवीन आदि मौजूद थे।





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