अलवर. विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस की ओर से दो बार चुनाव हारने वाले नेताओं के टिकट काटने की गाइड लाइन लागू की तो अलवर जिले में कांग्रेस का चुनावी गणित गड़बड़ाना तय है। अलवर जिले के 11 विधानसभा क्षेत्रों में से पांच सीटों पर टिकट के प्रबल दावेदारों में दो बार चुनाव नेता शामिल हैं। यदि ऐनवक्त पर ऐसे नेताओं का टिकट काटने का निर्णय हुआ तो कांग्रेस की दूसरी लाइन के नेताओं पर दांव आजमाने की मजबूरी होगी।
कांग्रेस की ओर से विधानसभा चुनाव के लिए प्रत्याशियों की पहली सूची मंगलवार शाम तक जारी किए जाने की उम्मीद है। पहली सूची में अलवर जिले की अधिकतर सीटों पर प्रत्याशियों के नाम की घोषणा होने की संभावना है। पार्टी के चुनावी रणनीतिकारों के सामने सबसे बड़ी दुविधा दो बार चुनाव हार चुके नेताओं को लेकर बनाई गई गाइड लाइन के लागू करने या नहीं करने को लेकर है। वहीं पैराशूटी नेताओं को टिकट नहीं देने का निर्णय भी चुनावी रणनीतिकारों को परेशान किए हुए हैं।
गाइड लाइन लागू हुई तो इन नेताओं पर गाज गिरना तय
अलवर जिले में दो बार चुनाव हारने वाले कांग्रेस नेताओं में पार्टी के राष्ट्रीय सचिव जुबेर खान, दीपचंद खैरिया, रमेश खींची, एमामुद्दीन खां दुर्रुमियां, नरेन्द्र शर्मा, जौहरीलाल मीणा, कृष्णमुरारी गंगावत आदि नेता शामिल हैं। इनमें से ज्यादातर नेता टिकट की पहली कतार में शामिल हैं। यदि पार्टी ने गाइड लाइन लागू की तो जिले की 11 में से 7 विधानसभा क्षेत्रों में पार्टी को नए चेहरों पर दांव लगाना होगा। इन विधानसभा क्षेत्रों में पार्टी की समस्या यह है कि ज्यादातर सीटों पर दूसरी पंक्ति के नेता ही तैयार नहीं किए गए। ऐसे में पुराने नेताओं के टिकट काटने में चुनावी रणनीतिकारों को खासी परेशानी आ रही है।
पैराशूटी नेता के टिकिट काटने में भी आ रहा जोर
कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी की ओर से पिछले दिनों विधानसभा चुनाव में पैराशूटी दावेदारों के टिकट काटने की बात कही थी। यदि यह गाइड लाइन भी लागू हुई तो बहरोड़, किशनगढ़ सहित कई अन्य विधानसभा क्षेत्रों में पार्टी के लिए मजबूत प्रत्याशी ढूंढने में परेशानी हो सकती है।
अलवर के चुनावी रणनीतिकार जितेन्द्र सिंह
कांग्रेस में वैसे तो टिकटों के फैसले का अधिकार पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट, विधानसभा में प्रतिपक्ष नेता रामेश्वर डूडी आदि नेताओं को दिया गया है, लेकिन अलवर जिले के 11 सीटों के टिकटों के फैसले का अधिकार पूर्व केन्द्रीय मंत्री जितेन्द्र सिंह के पास रहना तय है। इस कारण सिंह के समक्ष गाइड लाइन लागू करने या नहीं करने की दुविधा का कारण बना है।





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