जैसलमेर. किसी इंसान के जैसे ही जगहों की भी अपनी किस्मत होती है। यह बात भारत की पश्चिमी सीमा के अंतिम छोर पर बसे जैसलमेर के लिए तो एकदम सटीक बैठती है। मध्ययुग में जैसलमेर ‘सिल्क रुट’कहलाता था क्योंकि यहीं से होकर तत्कालीन भारत का बेशकीमती सामान मध्य-पूर्व एशियाई मुल्कों तक पहुंचता था। बाद में परिस्थितियों में आए बदलाव ने जैसलमेर को भौतिक रूप से विपन्न बना दिया और सिल्क रुट की उसकी पहचान बदलकर अकाल व सूखे के स्थायी डेरे के तौर पर होने लगी। समय का पहिया फिर घूमा। कोई चार दशक पहले जैसलमेर के मरुस्थलीय क्षेत्रों में तेल और गैस की संभावनाओं ने भारत सरकार का ध्यान अपनी ओर खींचा। करीब उसी समय यहां पोकरण में पहली बार परमाणु परीक्षण करवाए गए और विदेशियों ने सैलानी बनकर यहां पहुंचना शुरू किया। उसके बाद जैसलमेर के भूगर्भ में संचित खनिज पदार्थों से लेकर आबोहवा ने आधुनिक विकास की नई इबारत लिखी और वह हम सबके सामने है। इस दिवाली के मौके पर हर कोईयही प्रार्थना करता है कि ‘लक्ष्मी’ इसी तरह से आने वाले समय में भी जैसलमेर पर मेहरबान बनी रहे। जिस जैसलमेर के बाशिंदे रोजगार के लिए अपने घर-बार छोडग़ए थे, वे न केवल वापस लौटे हैं बल्कि बाहरी शहरों से लोग पर्यटन, प्रस्तर और पवन और सौर ऊर्जा उत्पादन जैसे उद्योगों से जुडकऱ कमाने-खाने के लिए जैसलमेर आकर बस गए हैं। ऐसे ही इंदिरा गांधी नहर के आगमन और नलकूप आधारित खेतीबाड़ी के चलते जिले के किसान सालाना अरबों रुपए की पारम्परिक और व्यावसायिक उत्पादन करने में सफल साबित हुए हैं।
50 लाख से 1200 करोड़ तक पहुंचा पर्यटन व्यवसाय
अनूठे स्थापत्य शिल्प ने दुनिया भर के सैलानियों को जैसलमेर आने पर विवष कर दिया।अब विदेशियों से कई गुना अधिक देशी पर्यटक यहां भ्रमण के लिए पहुंच रहे हैं। वर्ष 1970 के दशक के आखिर से प्रारंभ हुए पर्यटन व्यवसाय का टर्न ओवर 1980 में 50 लाख रुपए का था और आज यह जेट की गति से बढ़ता हुआ 1200 करोड़तक जा पहुंचा है। हर वर्ष लाखों की संख्या में घरेलू और विदेशी सैलानियों की आवक के चलते जैसलमेर में सैकड़ों होटलें, सम और खुहड़ी में 100 से ज्यादा रिसोट्र्स व कैम्प्स, 300 से ज्यादा रेस्टोरेंट्स, दर्जनों ट्रेवल एजेंसियां, सैकड़ों की तादाद में हैंडीक्राफ्ट से लेकर अन्य व्यवसाय से जुड़ी दुकानों से 10 हजार से ज्यादा लोगों को रोजगार मिल रहा है। शासन और प्रशासन के साथ पर्यटन व्यवसायी ही नहीं आम जैसलमेरी अगर पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए साझा प्रयास करें तो बिना चिमनी का यह उद्योग अपरिमित ऊंचाइयों तक पहुंच सकता है।
कभी डराती थी, अब हरसाती है हवाएं
जैसलमेर में मौसम के अनुसार ‘लू’ और ‘शीतलहर’ बनकर आमजन को डराने वाली तेज गति की हवाएं हजारों करोड़ के निवेश का कारण बन चुकी हैं। जिले के चप्पे-चप्पे में विशालकाय पवन ऊर्जा की चक्कियों ने बिजली के लिए तरसने वाले जैसलमेर को विद्युत हब बना दिया है। सरकार इससे करोड़ों कमा रही है तो यह बाहरी निवेशकों तथा यहां के हजारों लागों को मालामाल बना चुकी है। जिले में वर्तमान में करीब 3000 पवन चक्कियांं चलकर इतनी ही मेगावाट बिजली का उत्पादन कर रही हैं। सूरज की प्रखर किरणों के कारण जैसलमेर कल तक त्याज्य बना हुआ था लेकिन आज सौर ऊर्जा उत्पादन के लिहाज से यह कुदरती गर्मी उसके खूब काम आ रही है।
प्रस्तर ने दिलाया नाम और दाम
जैसलमेर में बहुतायत में पाए जाने वाले पीत पाषाणों के कारण ही इस शहर को स्वर्णनगरी का नाम मिला और इसी पत्थर से स्थानीय तथा बाहरी लोगों को सालाना 100 करोड़ का व्यवसाय भी मिल रहा है। जिले के सोनू गांव से निकलने वाली लाइम स्टोन की खदान की ढुलाई कर जैसलमेर का रेलवे स्टेशन पूरे जोधपुर मंडल का कमाऊ पूत बन गया। अगले साल तक हमीरा से सोनू तक की रेल लाइन पर मालगाडिय़ों के दौडऩे से जिला विकास के नए आयाम छू सकता है। वर्तमान में सोनू से जैसलमेर रेलवे स्टेशन तक लाइम स्टोन की ट्रकों के माध्यम से ढुलाई करने के काम में ही सैकड़ों लोगों को अच्छा रोजगार मिला हुआ है। कारीगरी के लिहाज से मुलायम जैसलमेर का पत्थर कलात्मक सुंदरता व स्वर्णिम आभा की चमक सात समंदर पार तक बिखेर चुका है। बाहरी इलाकों में स्थापत्य की प्राचीन कला दम तोड़ चुकी है, जबकि जैसलमेर में यह आज भी कायम है। जैसलमेर के रिको औद्योगिक क्षेत्र में 25 गैंगसा इकाइयां व 100 ब्लॉक कटर इकाइयां हैं। जेठवाई में 250 ब्लॉक कटर संचालित किए जा रहे हैं।
फैक्ट फाइल
-38 हजार वर्ग किलोमीटर जैसलमेर का क्षेत्रफल
-7.50 लाख से ज्यादा आबादी का निवास
-02 विधानसभा क्षेत्र जैसलमेर में
-2017 से नियमित हवाई सेवा का संचालन
विकास की ढेरों संभावनाएं
जैसलमेर ने पिछले दशकों के दौरान विविध क्षेत्रों में जो तरक्की की है, उससे कई गुना अधिक विकास की अभी यहां संभावनाएं मौजूद हैं। सरकार और प्रशासन को यहां के पर्यटन, पत्थर उद्योग, पवन ऊर्जा सहित अन्य स्रोतों से ऊर्जा उत्पादन के साथ नहरी क्षेत्र के विकास पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
-गोवर्द्धन कल्ला, वयोवृद्धपूर्व विधायक





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