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नेहड़ में नहर या बेरी का पानी, नर्मदा का नीर भी दूर की कौड़ी

जीतेश रावल @ जालोर. सरकार चाहे जो भी हो पर समस्याएं बरकरार ही है। फिर चाहे पानी का मुद्दा हो या खेती-बाड़ी। लोगों को न पीने का पानी मिल रहा है और न ही सिंचाई के लिए। कई गांव फ्लोराइड का दंश झेल रहे हैं सो अलग। चुनाव के दौरान हर बार लोगों से वादे किए जाते हैं, लेकिन अधिकतर पर अमल नहीं हो पाता। जिले के कई गांव विकास की बाट जोह रहे हैं, लेकिन इनमें से भी ज्यादातर गांव पानी पर ही अटके हुए हैं। यहां बसे लोगों को स्वच्छ पानी मिल जाता है तो मानों विकास ही हो गया। जलसंकट इतना है कि महिलाएं सुबह से शाम तक हलक तर करने की जुगत में ही जुटी नजर आती है। पुरुष खेतों में खड़ी फसल की सिंचाई करने की चिंता में रहते हैं। बारिश हुई तो ठीक अन्यथा जमाना पूरा ही खराब। जिले के पांचों विधानसभा क्षेत्र में कमोबेश यही स्थिति है। आहोर क्षेत्र के गांव हो या सांचौर-चितलवाना का नेहड़ क्षेत्र, जलसंकट से कोई अछूता नहीं है। विधानसभा चुनाव फिर सर पर है और चुनावी चौसर भी जम चुकी है। लोगों को आस बंध रही है कि इतने सालों तक जो न हुआ वो इन चुनावों के बाद हो सकता है। कई गांवों में ग्रामीणों का यह एक ही सवाल है और उसका उत्तर स्वच्छ जल है, लेकिन उत्तर भी केवल वादों तक ही सीमित रहा, धरातल पर नहीं आ पाया।
इसके अतिरिक्त कोई चारा नहीं
नेहड़ क्षेत्र में बेरियों से पानी लेने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं है। ग्रामीण बताते हैं कि नर्मदा नहर की वितरिकाओं में आने वाला पानी लोग पीने के काम लेते हैं। यह पानी नहीं मिलने पर बेरी में जमा पानी का उपयोग करते हैं। ग्रामीणों को इसका आज भी मलाल है कि इस क्षेत्र में सीधे तौर पर पेयजल वितरण के कोई प्रबंध नहीं हो पाए।
फिर भी नहीं दे पाए पानी
सत्ता में आने से पहले राजनीति दलों ने हर बार इस मुद्दे को भुनाया, लेकिन सरकार में आने के बाद लोगों को स्वच्छ जल नहीं दे पाए। नर्मदा का नीर भी दूर की कौड़ी साबित हो रहा है। जालोर शहर में ही कई-कई दिन तक क्लोजर हो जाता है। आहोर के कई गांवों में नर्मदा का पानी पहुंचा ही नहीं। गर्मी के दिनों में स्थिति इतनी गंभीर हो जाती है कि लोग एक मटका पानी के लिए तरसते हैं।

मुंहमांगे दामों पर बेच रहे पानी
ग्रामीण बताते हैं कि फ्लोराइड मुक्त पानी पिलाने के लिए गांवों में आरओ प्लांट लगाए गए, लेकिन मॉनिटरिंग के अभाव में प्लांट अव्यवस्था की भेंट चढ़ गए। कहीं तालों में बंद है तो कहीं चालू ही नहीं हो पाए। ऐसे में लोग टैंकरों से पानी मंगवाने को मजबूर हो रहे है। कई घरों में पीने के लिए भी टैंकरों का ही पानी ही काम में लिया जा रहा है। जलसंकट के कारण टैंकर संचालक भी मुंहमांगे दामों पर पानी बेच रहे हैं।
इतने सालों में कुछ काम नहीं हुआ
नया नारणावास गांव के भैराराम सरगरा व नारणावास के नेनाराम मेघवाल ने बताया कि आसपास के कई गांवों में लोग फ्लोराइड की समस्या झेल रहे हैं। इन गांवों को फ्लोराइड से मुक्त करने के लिए प्रभावी तरीके से काम होना चाहिए था, लेकिन इतने सालों में कुछ नहीं हुआ। हमारे गांव को स्वच्छ पेयजल देने के लिए चितहरणी के पास नलकूप खुदवाकर पूरा सैटअप किया गया, लेकिन यह नाकारा साबित हुआ, लोग आज भी परेशानी भुगत रहे हैं।
पानी पर अहम मुद्दे
- मिटाना चाह रहे फ्लोराइड का दंश
- पीने के लिए चाहिए स्वच्छ जल
- डी-फ्लोराइडेशन संयंत्रों की दरकार
- नर्मदा का पानी सब गांवों तक पहुंचे
- सिंचाई के लिए पर्याप्त जल संसाधन
मजबूरी में पी रहे फ्लोराइड...
क्षेत्र के कई गांवों में लोग फ्लोराइड युक्त पानी पीने को मजबूर है। गांव में लगे आरओ प्लांट भी बंद है। नर्मदा का पानी अभी इन गांवों को नहीं मिला है। आसपास के कई गांवों में यही स्थिति है।
- खेमराज दवे, ग्रामीण बागरा (आहोर)
झेल रहे हैं जलसंकट ...
गांव में पानी पैंदे बैठ चुका है। लोगों ने कुएं गहरे करवाए, लेकिन पानी की समस्या हल नहीं हुई। टांके बनवा रखे हैं, जिसमें टैंकरों से पानी मंगवा कर पीने के लिए स्टोरेज करते हैं। जो लोग टैंकर नहीं खरीद पाते वे खारा पानी पीने को मजबूर है।
जलाल भाई, कोमता (भीनमाल)
पानी की जुगाड़ में रहते हैं...
गांवों में पानी का पूरा संकट है। टंकियां सूखी पड़ी है तो आवाड़ों में भी पानी नहीं आ रहा। हैंडपम्प तक खराब है। ऐसे में पशुओं के लिए भी पानी का जुगाड़ करना भारी पड़ रहा है। लोग दिनभर पानी की जुगत में लगे रहते हैं।
- रमेशकुमार प्रजापत, नलदरा (सांचौर)



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