कोटा. आंगनबाड़ी केन्द्रों पर पढ़ाई का स्तर कुछ ज्यादा ही ऊंचा है, तभी इन मासूमों की न दीपावली की छुट्टियां लगती हैं, न बड़े दिन और गर्मी की, जबकि सरकारी स्कूलों में रविवार से ही दीपावली अवकाश घोषित हो चुका है, लेकिन आंगनबाड़ी केन्द्रों के बच्चे अब भी पढऩे जा रहे हैं।
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सरकार यह अंतर कर रही है स्कूल व आंगनबाड़ी केन्द्रों में। स्कूलों में तो दीपावली की छुट्टियां लगा दी, इन केन्द्रों पर जाने वाले मासूमों को दीपावली से एक दिन पहले तक जाना पड़ेगा। भैया दोज पर बहन को टीका करने के लिए इंतजार करना पड़ेगा। बच्चे केन्द्र पर होंगे और मन घर में रहेगा। विभाग की मानें तो दीपावली पर केन्द्रों पर आने वाले नौनिहालों को सिर्फ दो दिन की छुट्टियां ही मिलेंगी। जिले के सरकारी विद्यालयों में 28 अक्टूबर से 9 नवम्बर तक दीपवली अवकाश रहेगा।
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यह है उद्देश्य
केन्द्रों पर महज 3 से 6 वर्ष तक के बालक आते हैं। नौनिहालों को नर्सरी की तर्ज पर विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से बाल्यावस्था शिक्षा दी जा रही है। इसका उद्देश्य बालकों में स्वास्थ्य एवं स्वच्छता सम्बन्धी आदतों को डालना, पोषण में सुधार, प्रभावी संवाद से आत्मविश्वास जगाना, रंगों की पहचान, वर्गीकरण, मिलान संख्या समेत बौद्धिक विकास को बढ़ाना है। ताकि जब वह स्कूल में एडमिशन ले तो पूरी तरह से तैयार हो। जिले में 1272 केन्द्र हैं। जिन पर आसतन 15 बच्चे आते हैं।
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सुबह से दोपहर तक
आंगनबाड़ी केन्द्रों का समय अक्टूबर से मार्च तक सुबह 10 से दोपहर 2 बजे तक है। एक अप्रेल से 30 सितम्बर तक सुबह 8 से दोपहर 12 बजे तक था। इस दौरान प्रार्थना सत्र, मौखिक बातचीत, व्यायाम व खेल, अल्पाहार, भाषाई कौशल, रचनात्मक कार्य, बौद्धिक विकास के सत्र रहते हैं। दोपहर एक बजे भोजन व डेढ़ बजे तक रौचक व मनोरंजक खेल व अन्य गतिविधियां होती है।
वर्षभर भेदभाव
आंगनबाड़ी केन्द्रों पर वर्षभर में मात्र 11 अवकाश रहते हैं। इनमें ईदुलफितर, ईदुलजुहा, होली, धूलण्डी, रामनवमी, रक्षाबंधन, जन्माष्टमी, विजयादशमी, दीपावली, गोवर्धन पूजा व क्रिसमस पर अवकाश रहता है। जबकि स्कूलों में छुट्टियां रहने से बच्चों का मन भी मचलता है।
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जो महत्वपूर्ण हैं, वो छुट्टियां होनी चाहिए
भले ही केन्द्रों को खोला जाता है, पर बच्चों की संख्या में गिरावट आ जाती है। बड़े बच्चों को घर में देखते हैं तो इनका भी केन्द्रों पर आने को मन नहीं करता। जो महत्वपूर्ण है वो छुट्टियां तो होनी ही चाहिए।
पूजा राठौर, अध्यक्ष, कोटा संभाग, अखिल भारतीय महिला एवं बाल विकास संयुक्त कर्मचारी संघ।
बच्चों को नियमित पोषाहार मिल सके और वे स्वस्थ रहे। इसी दृष्टि से केन्द्रों पर ज्यादा अवकाश नहीं होते। 3 से 6 वर्ष तक के बच्चों को केन्द्र पर बुलाकर ही पोषाहार देते हैं।
ममता तिवारी, उपनिदेशक, महिला एवं बाल विकास विभाग।





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