श्रीगंगानगर। दीपावली पर्व से दो दिन पहले बार संघ श्रीगंगानगर के पूर्व अध्यक्ष इन्द्रजीत बिश्नोई और निजी स्कूल की अध्यापिका सुनीता बिश्नोई को सबसे बड़ा गिफ्ट मिल गया है। इस दंपति के सुपुत्र तुषार बिश्नोई ने राजस्थान सिविल जज कैडर परीक्षा 2017 में राजस्थान की वरियता सूची में टॉपर बनकर चयनित हुए है। तुषार ने इस परीक्षा में 190 अंक लेकर राजस्थान में पहला स्थान प्राप्त कर इलाके का नाम रोशन किया है। पुरानी आबादी के गुरुननगर में रहने वाले इस परिवार के तुषार ने यहां वर्ष 2010-11 में गुरु हरकृष्ण पब्लिक स्कूल से बारहवीं कक्षा 89 प्रतिशत अंकों से उत्तीर्ण की थी। इसके बाद उन्होंने भारती विद्यापीठ विश्वविद्यालय पुना से पंचवषीय योजना के तहत एलएलबी की डिग्री हासिल की। इसके उपरांत जयपुर में राजस्थान विश्विद्यालय से एलएलएम की डिग्री प्राप्त की। अपने पिता के साथ वकालत करने की बजाय राजस्थान न्यायिक सेवा के लिए तैयारियों का सिलसिला जारी रखा। पिता के प्रेरित होकर पर्यावरण के प्रति लगाव भी रखा। पर्यावरण के संबंध में देश विदेशों में भी सम्मेलनों में शामिल हुए। श्रीगंगानगर से चंद किमी दूर पंजाब के अबोहर क्षेत्र गांव पन्नीवाला में उनका पैतृक आवास है। घर में एक छोटी बहन रूपम बिश्नोई बीएससी में अध्ययनरत है। दीपावली से दो दिन पहले रविवार को जैसे ही इस परीक्षा में तुषार के चयन होने की सूचना मिली तो अधिवक्ता बिश्नोई के घर बधाई देने वालों का तांता लगा था। राजस्थान सिविल जज कैडर परीक्षा के टॉपर तुषार बिश्नोई का कहना है कि पीडि़तों को न्याय दिलवाना मेरा मकसद रहेगा। उन्हेांने पत्रिका से फोन पर बातचीत में बताया कि लोगेां का सबसे ज्यादा विश्वास न्यायालय पर है, ऐसे में मेरे पिता ने भी भविष्य में आगे बढऩे के लिए वकालत की बजाय न्यायिक सेवा का विकल्प चुनने का रास्ता बताया। इसी कारण उन्होंने वर्ष 2016 में जयपुर में राजस्थान विश्वविद्यालय से एलएलएम करने के उपरांत परीक्षा भी दी लेकिन सफल नहीं हो पाया। लेकिन उम्मीदों का दामन नहीं छोड़ा। जयपुर के अलग अलग एकेडमी में पूरी तैयारी की। इसका नतीजा यह रहा कि पूरे राजस्थान में टॉप स्थान के साथ चयन हो गया। चौदह से सौलह घंटे नियमित अध्ययन न्यायिक सेवा की तैयारियों में जुटे युवाओं के लिए तुषार बिश्नोई प्ररेक बन गए है। उनका कहना है कि दो साल पहले जब उन्होंने आरजेएस का पेपर दिया था भी तैयारियां करते थे और उसमें सफल नहीं होने के उपरांत भी अध्ययन करना नहीं छोड़ा। रोजाना चौदह से सौलह घंटे नियमित अध्यन करने से यह परिणाम आया है। पढाई के दौरान गाने सुनने और बच्चों के साथ खेलने से तनाव दूर किया जाता। परिवारिक सदस्यों और पिता के साथी अधिवक्ताओं के मार्गदर्शन को भी याद करते हुए उनका कहना था कि मार्गदर्शन कहीं से भी मिल सकता है लेकिन उस पर खरा उतरने का दवाब आप पर रहता है।





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