बाड़मेर. चुनावों में अधिकांश टिकटार्थी यह दावा करते फिरते है कि टिकट तो उनको ही मिलेगा और वे अपने-अपने गणित बताकर लोगों को ऐतबार करवाना चाहते है लेकिन वास्तव में कुछ जनप्रतिनिधि ऐसे रहे है जिन्होंने जिताऊ और सशक्त होने का अपना ऐसा मुकाम बना लिया है कि टिकट उनकी जेब में है। 1952 से अब तक हुए चुनावों में हार-जीत के बावजूद कई बार टिकट ला चुके प्रत्याशियों ने इसे साबित किया और कई तो ऐसे है कि पार्टी ने टिकट नहीं दिया तो अपने बूते जीत गए और फिर पार्टियों को गरज करनी पड़ी।
किसको कितनी बार मिला टिकट
वृद्धिचंद जैन- 1952 से राजनीति में सक्रिय रहे। सात बार विधानसभा का टिकट मिला। तीन बार सांसद का टिकट। चार बार विधायक और तीन बार सांसद रहे। हर बार कांग्रेस ने टिकट दिया। बाड़मेर विधानसभा से ही हर-बार चुनाव लड़ा।
मदनकौर- 1962 से सक्रिय। सात बार टिकट मिला। तीन बार जीत हुई। एक बार गुड़ामालानी से जीती। शेष बार पचपदरा से चुनाव लड़ा। मदनकौर ने कांग्रेस के अलावा एक बार कांग्रेस अर्स और एक बार जनता दल से चुनाव लड़ा।
अमराराम चौधरी- अमराराम चौधरी 1980 से राजनीति में। सात बार टिकट मिला, एक बार निर्दलीय रहे। मौजूदा विधायक एवं राजस्व मंत्री है। इस बार भी टिकट के सशक्त दावेदार है। तीन बार हार हुई। पहले कांग्रेस से तीन बार जीते। लगातार दो हार पर 1993 में कांग्रेस ने टिकट काटा तो निर्दलीय खड़े हुए और जीत गए। फिर भाजपा में आ गए। पचपदरा से ही हर बार चुनाव लड़ा।
चंपालाल बांठिया- बांठिया 1967 में राजनीति में सक्रिय हुए। पांच बार टिकट मिला। दो बार हारे और तीन बार जीते। जनसंघ, जनतादल और भाजपा से ही पचपदरा विधानसभा से चुनाव लड़ा।
गंगाराम चौधरी- 1962 में सक्रिय हुए। गंगाराम चौधरी को आठ बार टिकट मिला और एक बार निर्दलीय चुनाव लड़ा। गंगाराम पहले कांग्रेस में गुड़ामालानी से लगातार चार बार जीते। 1980 में कांग्रेस अर्स में चले गए लेकिन हार गए। 1985 में बाड़मेर विधानसभा में लोकदल व 1990 में जनता दलस से जीते। 1993 में टिकट नहीं मिला तो निर्दलीय जीते और फिर भाजपा में आ गए। 2003 का चुनाव भाजपा से चौहटन से जीते।
अब्दुल हादी- अब्दुल हादी को भी नौ बार चौहटन से टिकट मिला। तीन बार हादी कांगे्रस से जीते। 1980 में कांग्रेस अर्स में गए और हार गए। 1985 में लोकदल और 1990 में जनता दल से जीते। 1993 में फिर कांग्रेस ने टिकट दिया और हार गए। 1998 में कांगे्रस से जीते और 2003 में हार गए।
अमीनखां- अमीनखां 1980 में शिव विधानसभा की राजनीति में आए। इसके बाद कांग्रेस ने अमीनखां पर ही भरोसा किया। अमीन एक बार जीत और एक बार हार के गणित पर है। चार बार जीते है और चार बार हारे है। इस बार फिर टिकट के सशक्त दावेदारों में है।
अभी लगातार- कैलाश चौधरी दो बार,कर्नल सोनाराम चौधरी दो बार, मेवाराम जैन दो बार, अमराराम पांच बार, मदन प्रजापत दो बार, हेमाराम चार बार, लादूराम विश्नोई तीन बार अमीनखां नौ बार, पदमाराम दो बार चुनाव लडऩे के बाद इस बार फिर सशक्त दावेदारों में है।





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