झालावाड़। हुकुमत बदल गई। हुक्मरान बदल गए। सियासत बदल गई। सियासतदान बदल गए। लेकिन राजस्थान में न तो रियाया की दशा बदली और न सियासतदानों की फितरत। पता नहीं क्या बात है राजस्थान की धरती पर पांव रखते ही इन राजनीतिज्ञों के अंदर बैठा राजा जाग जाता है। मुगलिया सल्तनत का मुगालता तुरंत ही मन मस्तिष्क में उतर जाता है। और फिर जो होता है वो पूरी रियासत की रियाया देखती रह जाती है। 70 के दशक में दिल्ली से आया एक राजनेता मुख्यमंत्री हरदेव जोशी के कंधे पर पैर रखकर उंट पर सवार होता है तो 21वीं शताब्दी में शिक्षा का प्रकाश फैला राजस्थान प्रभारी और केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावेडकर खुद रियायत की बांट जोह रही रियाया के अंजुल में प्लेट रखकर पोहा खाते हैं। हद तो तब होती है जब जयपुर की जिम्मा संभालने वाले महापौर अशोक लाहोटी भी प्लेट थमाने का महामस्तकाभिषेक से कम नहीं समझते। अब अगर रियाया से हुक्मरान का रिश्ता रहेगा तो फिर ऐसे ही आमजन अंजुल बांधे विकास और बेहतर जिंदगी की राह देखता रहेगा। अब एक ताजा मामला सामने आया है झालावाड़ से, जहां भाजपा जिला उपाध्यक्ष गोविंद धाकड़ सीएम राजे के चरणदास बन गए हैं। सीएम से बात करने वे उनके पैरों में ही बैठ गए।
... सरकारों और हमारे जनप्रतिनिधियों से ये उम्मीद की जाती है कि वो हमेशा जनता के लिए मुस्तैद खड़े रहेंगे। लेकिन यहां बिल्कुल उलट हो रहे हैं, सत्ता का सुख भोग रहे राजनेता खुद तो आराम से खड़े रहते हैं और जनता को उन्होंने अपनी सेवा में मुस्तैद खड़ा रखते हैं। हालात बिल्कुल बदल गए हैं। राजनेता शासक की मुद्रा में और जनता याचक की मुद्रा में खड़ी है।
आखिर टिकट के लिए लोग किस—किस तरह के जतन करते हैं। आम आदम को ही याचक की मुद्रा में नहीं रहना पड़ता कई बार टिकट चाहने वाले राजनेता भी आगे बढ़ने के लिए इस तरह कतार में लगे नजर आते हैं। देश को आजाद हुए भले ही 70 साल से अधिक हो गए, लेकिन आज भी लोगों के जहन में दास्तां भरी हुई है। आज भी राजनेता सत्ता का सुख पूरी तरह भोग रहे हैं।





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