चूरू. राजकीय डेडराज भरतिया (डीबी) अस्पताल प्रशासन की गंभीर लापरवाही के कारण हृदय जांच से संबंधित इको कॉर्डियोग्राफी मशीन करीब दो साल से कमरे में धूल फांक रही है। इसका नतीजा मरीजों को बाहर निजी अस्पतालों में उक्त जांच करवानी पड़ रही है। सुविधा शुरू हो तो हृदय की बीमारी से पीडि़त एक से दो दर्जन मरीजों को प्रतिदिन निजी अस्पतालों में नहीं जाना पड़ेगा। निजी अस्पतालों में मरीजों को डेढ़ से दो हजार रुपए देने पड़ते हैं जबकि यहां पांच सौ रुपए में ही जांच हो जाएगी। जानकारी के मुताबिक डेढ़ साल पहले करीब 19 लाख रुपए से अधिक लागत की इको कॉर्डियोग्राफी मशीन रेडियोलॉजी विभाग में इंस्टाल करवा दी गई, लेकिन अभी तक शुरू नहीं हो सकी। मेडिकल कॉलेज के एसोसिएट प्रोफेसर डा. हनुमान जयपाल ने करीब आठ माह पहले विभाग की ओर से इसकी ट्रेनिंग भी ले ली। लेकिन अभी तक उन्हे लाइसेंस नहीं मिला। लाइसेंस के लिए सीएमएचओ कार्यालय में आवेदन कर दिया गया है। अस्पताल प्रशासन भी लाइसेंस के लिए आवेदन कर बैठ गया और मामला फाइलों में बंद होकर रह गया। सरकार बदल गई, अधिकारी बदल गए मामला अब कूड़े में जाने की स्थिति में पहुंच चुका है। यदि उसके लिए प्रयास नहीं किया गया तो लाइसेंस मिलना मुश्किल है।
बिना एंकुबेटर के गंभीर शिशुओं को कर रहे रैफर
इसी प्रकार बीमार नवजात शिशुओं को बचाने के लिए विभाग ने दो साल पहले अस्पताल को आईसीयू युक्त एंकुबेटर दिया था। लेकिन आज तक उसे एक बार भी उपयोग में नहीं लिया गया। एसएनसीयू में प्रतिदिन आठ से दस नवजात भर्ती रहते हैं। महीने में कम से कम 25 से 30 गंभीर नवजातों को बीकानेर व जयपुर रैफर करना पड़ता है। लेकिन रेफर नवजातों को आईसीयू युक्त एंकुबेटर होते हुए भी उन्हे सामान्य एंबुलेंस में भेजा जाता है। अस्पताल की ढिलाई के कारण एक बड़ी सुविधा शुरू नहीं हो पा रही। जानकारों का कहना है कि गंभीर शिशुओं को आईसीयू युक्त एंकुबेटर में रैफर किया जाए तो कुछ की जान बचाई जा सकती है। चूंकि कई नवजात सांस नहीं ले पाने कारण बीकानेर पहुंचने से पहले दम तोड़ देते हैं। कई तो वहां पहुंचते-पहुंचते इतने गंभीर हो जाते हैं कि वहां भर्ती होने के बाद दम तोड़ देते हैं। लेकिन अस्पताल प्रशासन की अनदेखी की वजह से 4.91 लाख रुपए का कीमती उपकरण कमरे में धूल फांक रहा है। इसके पीछे कारण बताया जा रहा है कि इसके लिए प्रशिक्षित स्टाफ नहीं है। इसके लिए कम से कम दो प्रशिक्षित स्टाफ चाहिए। ट्रांसपोर्ट एंकुबेटर में आक्सीजन, रेडियंट फोटोथैरेपी आदि सुविधाएं हैं। इससे गंभीर शिशुओं को रास्ते में ऑक्सीजन, रेडिएंट व फोटोथैरेपी आदि की सुविधा मिलती रहेगी। लेकिन अस्पताल प्रशासन इसके लिए जहमत नहीं उठाना चाह रहा।
भरतिया अस्पताल के संबंधित चिकित्सक को लाइसेंस जारी करने के लिए निदेशालय को पत्र लिखा गया है। इस महीने के आखिरी तक लाइसेंस जारी करवा दिया जाएगा।
डा. मनोज शर्मा, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी, चूरू
इको कॉर्डियोग्राफी के लिए लाइसेंस की जरूरत है। जिस चिकित्सक ने ट्रेनिंग ली है उनके नाम से लाइसेंस बनवाने के लिए सीएमएचओ कार्यालय में आवेदन कर दिया गया है। लाइसेंस आने पर शुरू कर दिया जाएगा। एंकुबेटर शुरू कराने के लिए जल्द ही कुछ स्टाफ की नियुक्ति की जाएगी।
डा. जेएन खत्री, अधीक्षक, डीबी अस्पताल, संबद्ध मेडिकल कॉलेज, चूरू





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