पाली।
‘साहब, अब मेरी बहू मर चुकी है, पहले से इसे मरने के बाद खूब घुमाया। अब तो इसकी मिट्टी खराब मत करो, आपको भगवान की कसम, इस शव को बाहर मत निकालो। आंखों में आंसू लिए घुमंतू जीवन जीने वाले परिवार की सुशीला व धापू गुरुवार को पुलिस, प्रशासन व ग्रामीणों के आगे हाथा-जोड़ी करते दिखी। उसका दर्द यह था कि जिस जंगल में उसकी बहू मिश्रानी का शव दफनाया गया, वहां ग्रामीण विरोध पर उतर आए और इसे बाहर निकालने की मांग करने लगे। हालात बिगड़ते देख मौके पर पुलिस बल तैनात किया गया। आखिरकार ग्रामीणों व घुमंतू परिवार से समझाइश कर व पाबंद करने के बाद मामला शांत हुआ।
पहले शव लेकर घूमा, फिर जंगल में दफनाया तो भी विवाद
नया गांव के निकट सडक़ किनारे जीवन यापन करने वाले बस्सी, जयपुर निवासी खानाबदोश भगवानसिंह मोगिया पहले तो पत्नी मिश्रानी की मौत के बाद उसका शव लिए घूमता रहा। बाद में प्रशासन के हस्तक्षेप से तालका गांव की गोचर भूमि में शव दफना दिया। यहां ग्रामीण शव बाहर निकालने की मांग करने लगे। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों ने ग्रामीणों को शव बाहर नहीं निकालने के लिए पाबंद किया गया, तब जाकर मामला सुलझा।





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