नई दिल्ली। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिली हार के बाद से पार्टी लोकसभा चुनाव से पहले कई संकटों से जूझ रही है। इन संकटों से पार्टी नेतृत्व को उबारने के लिए वित्त मंत्री संकटमोचक के रूप में उभरकर सामने आए हैं। यही कारण है कि सरकार और संगठन दोनों स्तर पर सक्रिय दिखाई देते हैं। चाहे बात बिहार में सहयोगी दलों के बीच सीट शेयरिंग फॉर्मूला निकालने की हो या फिर एलजेपी अध्यक्ष रामविलास पासवान को साधकर रखने की बात हो। वो अपना योगदान प्रभावी तरीके से दे रहे हैं। सरकार में लोगों का भरोसा बनाए रखने के लिए उन्होंने जीएसटी में राहत देकर महंगाई को नियंत्रण करने का संदेश दिया है। यही कारण है कि जेटली इन दिनों पार्टी और पीएम मोदी के लिए संकटमोचक के रूप में उभरकर सामने आए हैं।
सीट शेयरिंग फार्मूला
2013 के बाद अरुण जेटली पहली बार पार्टी के लिए अपनी संकटमोचक की भूमिका में नजर आए हैं। बिहार के नेताओं से भलीभांति परिचित अरुण जेटली ने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को रामविलास पासवान की पार्टी को 6 लोकसभा सीटों के अलावा एक राज्यसभा सीट देने के लिए तैयार किया। जबकि पहले शाह छह सीट तो देना चाहते थे, लेकिन राज्यसभा के लिए तैयार नहीं थे। राज्यसभा में रामविलास पासवान को भेजने का नुस्खा उन्हीं का था जो कारगर साबित हुआ और बिहार में एनडीए टूटने से बच गई। जेटली के प्रयासों का परिणाम है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, जेडीयू अध्यक्ष व बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और एलजेपी के अध्यक्ष रामविलास पासवान रविवार को एक साझा प्रेस कॉफ्रेंस कर बिहार की सीट शेयरिंग का ऐलान किया। बिहार की 40 लोकसभा सीटों में से भाजपा-जेडीयू 17-17 और 6 सीटों पर एलजेपी चुनाव लड़ेगी।





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