अलवर. लोकसभा उपचुनाव के बाद अलवर में एक बार फिर बड़ा बदलाव हो गया। जिले की 10 विधानसभा सीटों के नतीजों के मायने शेष राजस्थान से कुछ अलग हैं। यहां जनता ने भाजपा सरकार के खिलाफ तो वोट दिया है पर कांग्रेस की झोली भी नहीं भरी है। दोनों ही पार्टियों के लिए नतीजे सबक की तरह हो सकते हैं। जरूरी ये है कि इस सबक से कुछ सीखा जाए और असली कार्यकर्ता की कद्र की जाए। टिकट वितरण में पार्टी हित पर निजी हित हावी होने के कारण भी पटखनी मिलती है यह इस चुनाव परिणाम में साबित हो रहा है।
जिले मेंं जनता ने कांग्रेस को एक से बढ़ाकर बस चार सीटें ही दी हैं। वहीं भाजपा को नौ से समेटकर दो सीटों पर लाकर रख दिया है। इन दो सीटों पर भी गहराई से पड़ताल करें तो अलवर सीट पर संजय शर्मा की छवि ने जीत दिलाई है। हालांकि उनकी छवि पार्टी कार्यकर्ता के रूप में ही निखर पाई है। कार्यकर्ता पर सत्ता का रंग चढऩे पर जो हाल होता है वह शायद टिकट कटने पर ही उतर पाता है। कई पूर्व विधायकों का यह रंग जनता देख चुकी है। वहीं मुंडावर सीट में भाजपा जीती जरूर है लेकिन वहां कांग्रेस ने गठबंधन के चलते प्रत्याशी तक खड़ा नहीं किया था। गठबंधन का धर्म कितना निभा यह सबके सामने है। नतीजा भाजपा की जीत थी। वहीं ललित यादव ने कांग्रेस से टिकट नहीं मिलने पर चुनाव लडऩे का निर्णय किया। दूसरे स्थान पर रहकर अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराई। वहीं बानसूर में भाजपा के बागी निर्दलीय देवीसिंह शेखावत ने भी दूसरे स्थान पर रहकर पार्टी के टिकट वितरण को गलत साबित किया।
कांग्रेस की सीटों को देखें तो अलवर ग्रामीण पर जीत दर्ज की गई है। यहां टीकाराम जूली को सब जीता हुआ मानकर चल रहे थे। चूंकि उपचुनाव में यहां 27 हजार से अधिक वोटों से जीत दर्ज हुई थी। इस बार 26 हजार का अंतर रहा। जबकि बानसूर में पिछली मोदी लहर के समय विजयी रही शकुंतला रावत को इस बार भी जीता हुआ माना जा रहा था।
तीसरी सीट है राजगढ़-लक्ष्मणगढ़। यहां उपचुनाव में कांग्रेस ने 49700 वोटों की बढ़त ली थी। जौहरीलाल की जीत मेें भी बढ़त जिले की सबसे बड़ी रही। हालांकि तीसरे स्थान पर रहे बसपा के बन्नाराम मीना ने अपनी उपस्थिति महसूस करा दी है। उनके वोटों को कम नहीं आंका जा सकता। इधर, बसपा ने तिजारा और किशनगढ़बास सीटें जीत ली। यहां दीपचंद खैरिया और संदीप यादव की छवि के साथ बसपा का वोट बैंक जुड़ते ही राह आसान हो गई। अब अगले चुनावों में इन क्षेत्रों की राजनीति में बसपा फैक्टर कायम रहेगा। यहां कांग्रेस के दिग्गज डॉ. करणसिंह यादव और दुर्रू मियां को भी हार देखनी पड़ी। किशनगढ़बास में भाजपा के रामहेत सिंह की हार के साथ तय हो गया कि जिस एक विधायक का टिकट रिपीट किया गया जनता ने उस फैसले को भी स्वीकार नहीं किया। रामहेत की चुनावी बयानबाजी उनके लिए भारी पड़ गई। वहीं कुछ भीतरघात भी।
बहरोड़ में निर्दलीय बलजीत ने साबित कर दिया कि मेहनत और जनसम्पर्क का कोई तोड़ नहीं है। यही साबित किया है थानागाजी में निर्दलीय कांतीप्रसाद ने। थानागाजी में भाजपा तीसरे तो कांग्रेस चौथे स्थान पर रही है। जबकि भाजपा के बागी हेमसिंह दूसरे स्थान पर रहे।
दोनों ही पार्टियों के लिए नतीजों में सबक यही है कि जनमन की उपेक्षा भारी पड़ सकती है। किसी ने पांच साल तक सत्ता सुख भोगने के बावजूद ऐसा किया तो किसी ने टिकट वितरण में ही ऐसा कर दिया। अब नए विधायकों में सबसे ज्यादा चुनौती अलवर शहर के लिए है। शहर बदहाल स्थिति में है। यहां जीत भाजपा की हुई है तो सरकार कांग्रेस की बनेगी। उम्मीद है कि सबकुछ भुलाकर अलवर के विकास को प्राथमिकता दी जाएगी। चुनाव परिणामों को आगामी लोकसभा चुनाव से भी जोडकऱ देखा जा सकता है। भाजपा के लिए जिले से पहले ही लोकसभा की राह रुक चुकी है। अब विधानसभा चुनाव में यह और कठिन हुई है। दोनों ही दल अभी से ही लोकसभा के बारे में विचार शुरू करेंगे। नतीजों का विश्लेषण उनके लिए मददगार साबित होगा। साथ ही उन वादों को भी पूरा करना होगा जो चुनाव में किए गए थे।





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