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हाड़तोड़ मेहनत करते हैं जालोर-भीनमाल के किसान और कमाई जा रही गुजरात में

तुलसाराम माली
भीनमाल. इसबगोल का सर्वाधिक उत्पादन करने वाले किसान कमाई से वंचित है। क्षेत्र मेंभारी मात्रा में इसबगोल पैदा होता है, लेकिन किसानों को बेचने के लिए गुजरात जाना पड़ता है। यहां के मुकाबले गुजरात में किसानों को इसबगोल के ज्यादा दाम मिल रहे हैं।यहां के व्यापारियों व किसानों का कहना हंै कि गुजरात में इसबगोल व जीरा पर मंडी टैक्स नहीं होने से वहां पर व्यापारी जींसों की अधिक खरीद करते हैं, लेकिन यहां पर इसबगोल व जीरा पर मंडी टैक्स होने से बाहर के व्यापारी जींसों की खरीद के लिए कम ही पहुंचते हैं। इसके अलावा गुजरात में ही इसबगोल की फैक्ट्रियां भी है।इससे वहां पर किसानों को इस्बगोल के दाम ज्यादा मिलते हैं। जबकि इस जिले व राजस्थान में इसबगोल की अच्छी पैदावार होती है। अच्छे दाम के लिए किसानों को कई किलोमीटर का सफर तय कर इसबगोल बचने के लिए गुजरात जाना पड़ता है। पैदावार राजस्थान की एवं सरकार की रीति-नीति सहीं नहीं होने से गुजरात के व्यापारी राजस्थान की पैदावार पर चांदी काट रहे है। यहां के व्यापारियों का इसका फायदा कम ही मिलता है। स्थानीय मण्डी में इसबगोल नाम मात्र की बिकने में आती है। सारी इसबगोल की पैदावार गुजरात में बिकने जाती है। हालांकि पिछले कुछ सालों में यहां मंडी में भी इसबगोल की आवक भी बढ़ी है, लेकिन पर्याप्त दाम नहीं मिलते है। गौरतलब है कि राज्य सरकार ने यहां की कृषि मंडी को वर्ष 2005 में इसबगोल की विशिष्ठ मंडी घोषित किया था। विशिष्ठ इसबगोल की मंडी घोषित करने के पीछे सरकार का उद्देश्य इसबगोल पैदा करने वाले किसानों को सीधा फायदा पहुंचाना था, लेकिन धरातल पर यह योजना सफल नहीं हो रही। मंडी सचिव के मुताबिक सरकार ने जीरा व इसबगोल पर 50 पैसे प्रति सैकड़ा मंडी शुल्क है। किसानों का कहना है कि उपज बेचने की सीजन में मंडी में इसबगोल के पर्याप्त दाम नहीं मिलते है। किसानों को ओने-पोने दाम में ही इस्बगोल बेचना पड़ता है, लेकिन बाद सटोरिए चांदी काटते हैं।
24 भूखण्ड है आरक्षित
मंडी सचिव के मुताबिक इसबगोल की विशिष्ठ मंडी घोषित होने के बाद इसबगोल के व्यापारियों को मंडी में सुविधा दी जा रही है।इसके लिए 24 भूखण्ड इसबगोल व्यापारियों के लिए आरक्षित किए गए। यह सभीभूखण्ड मंडी में खाली पड़े हैं। एक भी व्यापारी ने इसबगोल के आरक्षित भूखण्ड नहीं खरीदे हंै। सरकार ने इसबगोल की विशिष्ठ मंडी तो घोषित कर दी, लेकिन सुविधाएं नहीं देने की वजह से यहां पर व्यापारी भी नहीं आ रहे है। व्यापारी नहीं आने से मंडी में इसबगोल भी नहीं आती है, जिससे व्यापारियों व किसानों को दोनों को नुकसान है।
यह हुई मंडी में आवक
यहां मंडी में 2004-05 में 4874 क्विंटल, 2005-06 में 4161 क्विंटल, 2007-08 में 87 क्विंटल, 2013-14 में 3719 क्विंटल, 2014-15 में 2982 क्विंटल, 2015-16 में 16815 क्विंटल व 2017-18 में 32984 क्विंटल इसबगोल की आवक हुई है। पिछले तीन साल में मंडी में इसबगोल की आवक तो बढ़ी है, लेकिन विशिष्ठ मंडी होने के बावजूद मंडी में नाममात्र की इसबगोल आती है। किसान यहां पर मंडी में इसबगोल बेचने आते ही नहीं है। मंडी में ही इसबगोल के एक-दो ही व्यापारी है।
गुजरात जाते हैं किसान...
यहां की मंडी इसबगोल की विशिष्ठ मंडी है। यहां पर पिछले दो-तीन साल से इसबगोल की आवक बढ़ी है, लेकिन क्षेत्र के कई किसान गुजरात जाकर इसबगोल को बेचते है। यहां पर इसबगोल की फैक्ट्रियां नहीं होने से मंडी में इसबगोल के व्यापारी भी दो ही है। गुजरात में इसबगोल की फैक्ट्रियां होने से किसानों को गुजरात में दाम भी अधिक मिलते है। गुजरात में इस्बगोल पर मंडी टैक्स भी नहीं है। यहां पर प्रति सैकड़ा 50 पैसे टैक्स भी है।
- जयकिशन, मंडी सचिव, कृषि मंडी, भीनमाल



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