पाली/नारलाई। लिंगानुपात में निरंतर हो रहे असंतुलन एवं सरकार के बेटी बचाओ के दावों के साथ इक्कीसवीं सदी में जी रही मानव सभ्यता के लिए घिनौनी घटना सोमवार को सामने आई। कुछ लोग डेढ़ वर्षीय बेटी को जंगल में फेंक कर चले गए। यह घटना समाज विकास के तमाम दावों की पोल खोल गई तो समाज के लिए भी कई सवाल छोड़ गई।
रानी थाना क्षेत्र के विंगरला-नाडोल मार्ग के बीच सोमवार को लोग डेढ़ माह की मासूम बालिका को झाडिय़ों में फेंककर चले गए। दोपहर में जब बालिका झाडिय़ों में रोती रही। उसके रोने की आवाज सुनकर वहां से गुजर रहे ग्रामीणों ने उसे देखा और पुलिस को सूचना दी। बालिका के स्वेटर पहना हुआ था, उस पर किसी प्रकार के चोट के निशान भी नहीं थे। सूचना पर पुलिस व एम्बुलेंस 108 कर्मी मौके पर पहुंचे। प्राथमिक उपचार के बाद उसे पाली के बांगड़ मेडिकल कॉलेज अस्पताल लाया, जहां शाम को उपचार के दौरान उसका दम टूट गया। दिल दहलाने वाली इस घटना से हर कोई हैरान है। उसके परिजनों का पता नहीं चला है। पुलिस मामले की जांच कर रही है।
नाडोल पुलिस चौकी प्रभारी कमल सिंह के अनुसार दोपहर में नाडोल के निकट झाडिय़ों में डेढ़ माह की बालिका के रोने की आवाज सुनाई तो ग्रामीण वहां पहुंचे। उन्होंने एम्बुलेंस के माध्यम से उसे नाडोल सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र पहुंचाया, उसकी हालत ठीक नहीं होने पर उसे बांगड़ अस्पताल लाया गया। सूचना पर बाल कल्याण समिति सदस्य किशोर सोमनानी, सुदर्शन उदावत अस्पताल पहुंचे। बालिका को भर्ती कराया गया, लेकिन शाम को उसका दम टूट गया। शव का मंगलवार को पोस्टमार्टम किया जाएगा।
पुलिस के लिए भी चुनौती
पुलिस को अब तक यह पता नहीं चला है कि बालिका के परिजन कौन है। बालिका को झाडिय़ों में किसने और क्यों फेंका, इस बारे में पुलिस को जानकारी नहीं है। यह मामला खोलना पुलिस के लिए भी चुनौती भरा है।
पत्रिका व्यू....
बेटी ईश्वर का वरदान होती है। वह घर की शोभा होती है। वर्तमान भौतिकवादी दौर में जहां बेटे कर्तव्यों के प्रति सचेत कम होते जा रहे हैं, जबकि बेटियां दोहरी जिम्मेदारी संभालती है। इक्कीसवीं सदी के दौर में जब बेटियां आसमान छू रही है। ऐसे समय में यह घिनौनी घटना मानव समाज के लिए जघन्य है। कौन मां-बाप हैं, जो अपने कलेजे के टुकड़े को भरी सर्दी में एक स्वेटर भर में झाडिय़ों में फेंक गए। ऐसा करते उन्हें दया नहीं आई। सरकार बेटी बचाओ बेटी बढाओ समेत कई अभियान चलाकर बेटी के उत्थान के प्रयास कर रही है, लेकिन ऐसी घटनाएं फिर से सोचने पर मजबूर करती है। कहीं हम पीछे की ओर तो नहीं जा रहे। तमाम विकास के बावजूद हमारी मानसिकता क्यूं नहीं बदल रही। क्यूं बेटी आज भी उपेक्षित, असुरक्षित है। हमें ही इन सवालों के हल ढूंढने होंगे।





No comments:
Post a Comment