राजस्थान की टीम में सीकर के पांच खिलाड़ी, अक्षित चौधरी ने जीता कांस्य
सीकर. यदि मन में कुछ करने का जज्बा हो तो कुछ भी असंभव नहीं है। धोरों के लाल ने दिल्ली में आयाजित ६४ वीं राष्ट्रीय तैराकी प्रतियोगिता अंडर १७ वर्ग में राजस्थान की झोली में पहला पदक डाला है। धोरों का यह लाड़ला भढ़ाडर स्थित स्वामी केशवानंद शिक्षण संस्थान का कक्षा ग्यारवीं का नियमित छात्र अक्षित चौधरी है। खास बात यह है कि प्रदेश को अभी तक एसजीएफआई की प्रतियोगिताओं में पुरुष वर्ग में कोई पदक नहीं मिला था। इस इतिहास को भी चौधरी ने अपनी मेहनत के दम पर बदल दिया है। पुुरुष और महिला वर्ग की टीम में अकेले केशवानंद स्कूल के पांच खिलाड़ी है। राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में बेटियां जरूर दो पदक जीत चुकी है, लेकिन बेटों ने पहली बार खाता खोला है। १९ दिसम्बर तक चलनी वाली प्रतियोगिता में प्रदेश को कई पदक और मिलने की उम्मीद है। इधर, जैसे ही पदक जीतने की सूचना राजस्थान और केशवानंद शिक्षण समूह में पहुंची तो आतिशबाजी का दौर शुरू हो गया। संस्था निदेशक रामनिवास ढाका ने बताया कि खेल जगत में अक्षित के कारनामे से पूरे प्रदेश के साथ शेखावाटी का मान बढ़ा है। अक्षित के पिता आसाराम चौधरी राजस्थान पुलिस सेवा के सीनियर अधिकारी है। अक्षित यहां के तैराकी के माहौल और टॉप खिलाडि़यों के यहां प्रशिक्षण लेने के बाद जयपुर के एक नामी स्कूल स्कूल को छोडक़र सीकर आया। दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में आयोजित ६४ वीं तैराकी प्रतियोगिता में केशवानंद स्कूल के अक्षित चौधरी के अलावा अजय डांगर, उर्मिला बिजाराणियां, बलवीर व फिजा कायमखानी है। एक ही स्कूल से इतने खिलाड़ी शामिल होने का भी रिकॉर्ड कायम हुआ है। इससे पहले भी संस्थान के कई होनहार राष्ट्रीय स्तर की ओपन प्रतियोगिताओं में पदक दिला चुके है।
नियमित अभ्यास से मिली
पत्रिका से खास बातचीत में होनहार अक्षित ने बताया कि बचपन से तैराकी का शोक था। लेकिन इस शौक को जज्बे की कहानी में बदलने का मौका सीकर में ही मिला। यहां खेल और कॅरियर के बारे में मिली जानकारी के बाद मेहनत भी दुगनी कर दी। उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय प्रतियोगिता के लिए वह महीनों से सात-सात घंटे कोच विजय के सानिध्य में अभ्भ्यास करने में जुटे थे। इस कारण शनिवार के मैच में बड़ी सफलता मिली।
जज्बे से लिखी सफलता की कहानी
धोरों में जहां तैराकी व नौकायन जैसे खेलों की कल्पना महज एक सपना लगता है। लेकिन यहां के लोगों ने मेहनत के दम पर इस मिथक को भी तोड़ दिया है। पहले स्कूल व कॉलेज स्तरीय प्रतियोगिता के लिए विभागों को निजी तरणताल संचालकों की शरण लेनी पड़ती थी। लेकिन पिछले दो वर्ष में आए बदलाव के बाद अब स्कूल-कॉलेजों में तरणताल बन गए है। संस्था संचालकों का कहना है कि विद्यार्थियों के रूझान को देखते हुए तरणताल तैयार कराए गए है।





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