संभलकर निकले घर से बाहर, जिले में श्वानों का आंतक
पूरण ङ्क्षसह शेखावत
सीकर. शेखावाटी में सर्दी के बाद अब आक्रामक हो रहे श्वान आक्रामक हो गए हैं। चाहे जहां झपटा मारकर लोगों को शिकार बना रहे हैं। स्थिति यह है कि अकेले कल्याण अस्पताल में प्रतिदिन औसतन १८ लोग श्वान के शिकार होकर उपचार के लिए आ रहे हैं। अस्पताल स्टॉफ की माने तो पिछले वर्षों की तुलना में इन आंकडों में २६ फीसदी तक की बढ़ोतरी हुई है। विडबंना की बात है कि शहर में वर्षों से श्वान की नसबंदी का प्रोजेक्ट भी ठप पड़ा है। नगर परिषद और पशुपालन विभाग के पास इनकी की संख्या का आंकड़ा तक भी मौजूद नहीं है।
पीएचसी पर नहीं है वेक्सीन
जिले में स्वास्थ्य केन्द्रों पर दवा की उपलब्धता की स्थिति का इस बात से पता चल रहा है कि पीएचसी व सीएचसी पर एंटी रेबीज वेक्सीन जैसी दवा भी नहीं है। जबकि श्वान के काटने के बाद सबसे पहले एंटी रेबीज वेक्सीन लगाना होता है। दवा नहीं मिलने के कारण ग्रामीण अंचल से आने वाले मरीजों जिला अस्पताल आना पड़ता है। जबकि पशुपालन विभाग में श्वान को एंटी रेबीज का निशुल्क टीका लगाया जाता है।
रोजाना १८ मरीज
दिसम्बर माह की शुरूआत के २५ दिन में ८८६ लोग श्वान के काटने के बाद एसके अस्पताल
पहुंचे हैं। अस्पताल के आंकडों को देखा जाए तो रोजाना औसतन १७ से १८ लोग आ रहे हैं। सबसे अधिक परेशानी इस
बात की है कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य केन्द्रों पर एंटी रेबीज वेक्सीन नहीं है।
एेसे में मरीजों को निजी अस्पतालों की शरण लेनी पड़ रही है।
पीएचसी पर नहीं है वेक्सीन
जिले में स्वास्थ्य केन्द्रों पर दवा की उपलब्धता की स्थिति का इस बात से पता चल रहा है कि पीएचसी व सीएचसी पर एंटी रेबीज वेक्सीन जैसी दवा भी नहीं है। जबकि श्वान के काटने के बाद सबसे पहले एंटी रेबीज वेक्सीन लगाना होता है। दवा नहीं मिलने के कारण ग्रामीण अंचल से आने वाले मरीजों जिला अस्पताल आना पड़ता है। जबकि पशुपालन विभाग में श्वान को एंटी रेबीज का निशुल्क टीका लगाया जाता है।
तालमेल का अभाव बड़ी वजह
सर्दी के मौसम में गलियों में घूमने वाले आवारा श्वानों को एंटी रेबीज वेक्सीन नहीं लगाया जाता है। एंटी रेबीज वेक्सीन नहीं होने से श्वान रेबीज के शिकार हो जाते हैं और इस कारण वे एक दूसरे पर हमला कर देते हैं और लोग दिखाई देने पर श्वान कई बार हमला कर देते हैं। इसके अलावा नगर परिषद और पशुपालन विभाग के बीच तालमेल का अभाव होने के कारण श्वान की नसबंदी का कार्यक्रम पिछड़ गया है। इस कारण पिछले दस साल में आवारा श्वान की संख्या में इजाफा हुआ है।





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