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विधानसभा चुनाव में इन नए चेहरों ने किया कमाल, कोई चुनाव जीत गया, किसी ने खुद को साबित किया

करीब दो दशक के बाद इस विधानसभा चुनावों में अलवर जिले की राजनीति में नए चेहरों का उदय हो गया है। कुछ चुनाव जीत गए तो कुछ ने चुनाव नतीजों से खुद को साबित किया है। साथ ही कई युवा ऐसे हैं जिन्होंने बड़ें नेताओं की धोक परम्परा की बजाय जनता के मन की थाह ली। इसमें वे कामयाब भी होते नजर आए। अलवर जिले के लिए सबसे खास बात यह है कि 2013 से 2018 तक जिले की राजनीति के सिरमौर रहे नेताओं की जमीन खिसक चुकी है।किसी ने पार्टी के बागी होकर तो किसी ने खुद अपने दम पर विधानसभा क्षेत्र में जनता के सामने विकल्प खड़ा कर दिया। आगामी पांच साल के बाद के विधानसभा के चुनावों में इन चेहरों को महत्व देना पार्टियों की मजबूरी होगी।

रिंकी वर्मा ने अपने बूते पर किया प्रचार, उपस्थिति जोरदार

अलवर ग्रामीण विधानसभा क्षेत्र से रिंकी वर्मा ने पहले चुनाव में ही जनता की पसंद बनने का बखूबी प्रयास किया। 25 हजार से अधिक वोट लेकर यह दिखा दिया कि इस राजनीति में उनकी जगह है। आगे जनता के बीच रहकर कार्य किए तो बदलाव भी हो सकते हैं। रिंकी पहले छात्रसंघ चुनावों में भी सक्रिय रही हैं। वहीं से आगे राजनीति में आने की उनको राह मिली है। इन चुनाव परिणामों से उनका उत्साह बढऩा लाजिमी है। उनका भी यह पहला चुनाव रहा है। आगे उनकी जो भी रणनीति हो पर जनता ने विश्वास किया है।

जिले में सबसे कम उम्र के विधायक संदीप यादव

इस बार अलवर जिले से सबसे कम उम्र के विधायक संदीप यादव (36 साल) हैं। विधानसभा का पहला चुनाव लड़ा। चुनाव लडऩे की तैयारी पिछले करीब चार साल से कर रहे थे। भाजपा सरकार में रहते हुए उनको युवा बोर्ड में उपाध्यक्ष बनाते हुए उप मंत्री का दर्जा दिया गया है। राजकीय कॉलेज बीबीरानी से छात्रसंघ अध्यक्ष रहे संदीप कम उम्र में एक के बाद एक राजनीतिक सीढिय़ां चढ़ते गए हैं। इस चुनाव में तो तिजारा में जनता की पहली पसंद बन गए। जबकि भाजपा से टिकट नहीं मिला तो बागी होकर बसपा से चुनाव लड़ बैठे। यहां के मतदाताओं ने कुछ ही दिन में मन बना लिया कि इस बार संदीप यादव को विधायक बनाकर भेजना है। साधारण व साफ छवि को जनता ने पंसद किया।

निर्दलीय बलजीत ने सबसे अधिक वोट लिए

जिले में दो निर्दलीय चुनाव जीते। जिसमें बलजीत यादव ने दूसरे नम्बर पर सबसे अधिक 55 हजार से अधिक वोट लेकर जीत दर्ज की। पिछली बार भी निर्दलीय ही ताल ठोकी और दूसरे नम्बर पर रहे थे। वे पिछले करीब दस सालों से क्षेत्र में सक्रिय रहे। अपने कार्यकर्ता व समर्थकों के बराबर सम्पर्क में रहे। उसी का नतीजा है कि इस जनता ने उनको जीत दिला दी। हाल में ही कांग्रेस में शामिल हुए थे। लेकिन टिकट नहीं मिला तो निर्दलीय चुनाव लड़ा। समर्थकों के उत्साह के साथ खुद की ऊर्जा को कभी कम नहीं होने दिया। यही उनकी जीत का मंत्र रहा।

...तो ललित यादव होते सबसे कम उम्र के विधायक

कांग्रेस ने मुण्डावर विधानसभा सीट को समझौते में देकर सक्रिय होकर काम करने वाले पार्टी के कार्यकर्ताओं को निराश किया तो ललित यादव बागी हो गए और बसपा से चुनाव लड़ा। जबकि यहां पर कांग्रेस ने लोजद को समर्थन दिया। लेकिन मुण्डावर की जनता ने उनके क्षेत्र में रहकर काम करने वाले कार्यकर्ता को सिर आंखों पर बैठाया। दूसरे नम्बर पर रिकॉर्ड 55 हजार वोट प्राप्त किए। इससे पहले ललित यादव राजस्थान विश्वविद्यालय के महासचिव रहे हैं। पिछले कई सालों से कांग्रेस पार्टी से जुडकऱ कार्यकर्ता बन काम किया। उसी का नतीजा है कि मुण्डावर में कांग्रेस के समझौते वाले कदम को जनता ने नकारा और क्षेत्र में रहकर काम करने वाले को खूब समर्थन दिया।

देवी सिंह ने पहले चुनाव में बदल दिए समीकरण

बानसूर से देवी सिंह शेखावत ने पहली बार ही निर्दलीय चुनाव लड़ा। जिस पार्टी से टिकट मांगा उससे ज्यादा वोट हासिल किए। दूसरे नम्बर पर आए। यूआईटी चेयरमैन के पद से राजनीतिक सफर शुरू किया है। इस बार भाजपा से टिकट मांगा। टिकट नहीं मिलने पर बागी होकर निर्दलीय चुनाव लड़ा। निर्दलीय के रूप में देवी ङ्क्षसह शेखावत ने 47 हजार से अधिक रिकॉर्ड वोट प्राप्त किए। उनकी स्वच्छ छवि को जनता ने पसंद किया है। माना जा रहा है कि इतने वोट मिलना पूरी तरह से जनता के बीच रहने का नतीजा है।

बन्नाराम ने चुनाव में नए अंदाज में जगह बनाई

राजगढ़-लक्ष्मणगढ़ विधानसभा क्षेत्र से बसपा प्रत्याशी बन्नाराम मीणा ने अच्छे वोट लेकर अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी है। जबकि यहां भाजपा व कांग्रेस के पार्टी के दो पुराने नेता व उनके परिवार से जुड़े प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे थे। फिर भी करीब 28 हजार से अधिक वोट लेकर अपनी जगह बनाई है। इस समय बन्नाराम अलवर सरस डेयरी के चेयरमैन भी है। इसस पहले पंचायत समिति सदस्य का चुनाव भी लड़ चुके हैं। इस चुनाव में नए अंदाज में अपनी जगह बनाई है। बड़ी संख्या में युवा उनके साथ नजर आए।



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