जयपुर. सरकार के लिए बड़ी चुनौती कर्ज माफी के साथ नए कर्ज की भी रहेगी। रबी की बुआई के लिए किसान लोन ले चुके हैं। चार माह बाद यह सीजन पूरा हो जाएगा। इसके तत्काल बाद किसान खरीफ की फसल की तैयारी करेगा। उस समय किसान को खाद-बीज के लिए फिर रुपयों की जरूरत पड़ेगी। ऐसे में किसान कर्ज के लिए बैंक पहुंचेगा। राष्ट्रीयकृत बैंकों के लिए कर्ज देना ज्यादा मुश्किल नहीं रहेगा। सहकारी बैंक के लिए मुश्किल हो सकती है। सहकारी बैंकों की हालत ज्यादा ठीक नहीं है। पहले ही कई बैंकों में सरकार की हिस्सा राशि कम है।
बैंक में सरकार की 25 प्रतिशत हिस्सेदारी जरूरी
सहकारी अधिनियम के तहत बैंक में सरकार की 25 प्रतिशत हिस्सेदारी जरूरी है। बैंक लगातार सरकार से उसकी हिस्सा राशि की मांग करते रहे हैं। कई जिलों के बैंक में तो सरकार की हिस्सा राशि 0 प्रतिशत है। बैंकों के लिए नाबार्ड की भागीदारी की परेशानी बनी हुई है। कभी 55 प्रतिशत पुनर्भरण करने वाला नाबार्ड अब 40 से 45 प्रतिशत ही पुनर्भरण कर रहा है। राज्य सरकार लगातार यह इसे बढ़ाने की मांग करती रही है। इसके साथ पुनर्भरण में तीन माह की देरी हो रही है। जून-जुलाई में मिलने वाली मदद अक्सर सितम्बर माह में मिल रही है। ऐसी स्थिति में सरकार के लिए अधिकतम ऋण वितरण का टारगेट भी रहेगा।
बैंकों की माली हालत का भी रखना होगा ध्यान
वर्ष 2013 में कांग्रेस सरकार ने ही 17 हजार करोड़ रुपए के सहकारी ऋण बांटे थे। पांच साल में सहकारी बैंकों ने बारह से पन्द्रह हजार करोड़ रुपए के ऋण वितरित किए। अब बैंकों की माली हालत और ऋण माफी के साथ अधिकतम ऋण वितरण करना भी सरकार के लिए चुनौती रहेगी।





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