कोटा. मतदान केन्द्र के बाहर एक छोटी से टेबल और कुर्सियों पर बैठे चार लोग। सुनने में अजीब लग सकता है, लेकिन सत्ता का रास्ता इसी कुर्सी से होकर जाता है। ये चार लोग वे होते हैं, जो इलाके के नतीजे पलटने की ताकत रखते हैं। परिणाम की संभावित घोषणा भी सबसे पहले यही करते हैं। इन पर बैठने वाले कई चेहरे अनाम हैं, जो कई बरसों में तैयार होते हैं। इस कुर्सी की क्षमता और इस पर बैठने वाले लोगों का संघर्ष और संपर्क पार्टी को मजबूत बनाता है। कोटा जिले में करीब 1450 बूथों पर राजनीतिक दलों ने बूथ कार्यकर्ताओं की टीम मैदान में उतार दी है, जो दिन-रात जुटी हुई है। कोटा शहर में करीब 626 बूथ हैं। बूथ मैनेजमेंट को लेकर पेश है एक रिपोर्ट।
वार्ड के हर व्यक्ति को काका, दादा, भैया, भाभी, बहू, बहन, अम्मा के रूप में न केवल जानते हैं, बल्कि परिवारों की किचन पॉलिटिक्टस का हिस्सा होता है बूथ मैनेजर।
ये है बूथ मैनेजमेंट टीम
11 लोगों की टीम एक बूथ पर लगती है।
2 मतदान केन्द्र पर एक कार्यकर्ता स्थाई रूप से बैठता और एक रिलीवर का काम करता है।
5-6 लोग इसमें टेबल पर बैठने वाले होते हैं। जो सूची में नाम देखने, पर्ची बनाने, मतदान कर चुके लोगों के नाम काटने और रिलीवर का काम करने वाले शामिल होते हैं।
2 कार्यकर्ता टेबल पर मतदान के लिए नहीं पहुंचे लोगों की जानकारी जुटाते रहते हैं।
2 कार्यकर्ता मतदान केन्द्र के पास घूमते रहते हैं, इनका काम वोट देने नहीं आने वाले लोगों को बुलाकर लाना होता है।
बूथ कार्यकर्ता की ये होती है खासियत
करीब 1 हजार लोगों के चेहरे याद रखते हैं। एक बूथ पर 600 से 1 हजार तक मतदाता होते हैं। बूथ क्षेत्र के रहवासी होने के कारण ये लोग उस क्षेत्र में रहने वाले एक-एक मतदाता को जानते हैं और उनका चेहरा भी याद रखते हैं।
ध्यान होती है वोटर की मनोस्थिति
बूथ पर बैठने वाले कार्यकर्ता मतदाताओं के मोहल्ले, बस्ती या क्षेत्र के ही होते हैं, ऐसे में वे लोगों से लगातार मिलते रहते हैं। उन्हें घर-परिवार में मौजूद मतदाताओं की मनोस्थिति की भी पूरी जानकारी होती है।
मतगणना से पूर्व बता देते हैं परिणाम
बूथ कार्यकर्ता मत का अंदाजा लगाते हुए सूची में निशान लगाते हैं। मतदान के बाद निशानों की समीक्षा करके एक अनुमानित परिणाम बता देते हैं। सभी बूथों की इस तरह की रिपोर्ट पर मतगणना से पहले संभावित परिणाम बता देते हैं।
यह है टेबल का पूरा खेल
चुनाव के तीन महीने पहले से बूथ पर काम शुरू हो जाता है। मतदाता सूची के हिसाब से पहले मतदाताओं का मिलान और फिर वोटर आईडी बने हैं या नहीं इसकी जानकारी लेकर बीएलओ से आईडी तैयार करवाते हैं। इसके अलावा मतदाता सूची में नए मतदाताओं के नाम जुड़वाना, मतदाता सूची के प्रारूप प्रकाशन के बाद उसका अवलोकन करना, आपित्त दर्ज कराना, गलतियों का संशोधन करने का कार्य करते हैं। जब मतदाता सूची फाइनल होती है तो उसके बाद भी मिलान करते हैं।
सबकी अपनी रणनीति
भाजपा
भाजपा ने एक साल से बूथ प्रबंधन की तैयारी शुरू कर दी थी। एक बूथ स्तरीय कार्यकारिणी में बूथ अध्यक्ष सहित 11 लोग लोग शामिल हैं। इसके अलावा पन्ना प्रभारी लगाए हैं। एक बूथ पर 20 पन्ना प्रभारी हैं। इस तरह एक बूथ के लिए करीब 31 कार्यकर्ता सक्रिय हैं। बूथ कार्यकर्ताओं ने मतदान से तीन दिन पहले ही पर्ची बांटना शुरू कर दिया है। इसके अलावा बूथ कार्यकर्ता घर-घर जाकर मतदान के लिए आने का भी अनुरोध कर रहे हैं। मतदान के दिन भी कार्यकर्ताओं मतदाताओं के घर-घर जाएंगे।
कांग्रेस
कांग्रेस ने भी करीब एक साल पहले से ही बूथ को मजबूत करने का कार्य किया। कार्यकर्ताओं को बूथ प्रबंधन का प्रशिक्षण भी दिया। बूथ कार्यकर्ता के साथ कांग्रेस ने भी पन्ना प्रभारी बनाए हैं। ये पन्ना प्रभारी मतदाता सूची के एक पन्ने में जितने मतदाताओं के नाम हैं, उनके संपर्क में रहेंगे। वो मतदान केन्द्र तक पहुंचे या नहीं, इसका ध्यान रखेंगे। कांग्रेस के बूथ कार्यकर्ता भी पर्ची बांटने में जुटे हैं।
अन्य प्रत्याशी
कांग्रेस भाजपा के अलावा आम आदमी पार्टी की ओर से भी बूथ और वार्ड स्तर पर कार्यकर्ता सक्रिय किए गए हैं। कई निर्दलीय प्रत्याशी भी बूथ प्रबंधन पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। राजनीतिक दलों की तर्ज पर वे भी घर-घर जाकर पर्चियां बंटवा रहे हैं। कई तो पर्ची के साथ पीले चावल भी भेज रहे हैं।





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