ज नता का मत सामने आ गया। परिणाम चौंकाने वाले हैं। सवाईमाधोपुर की जनता ने सत्ताधारी पार्टी का सफाया कर दिया। चारों सीटों पर भगवा रंग जनता की नजरों से उतर गया। ऐसे परिणाम की तो शायद किसी को भी उम्मीद ना होगी। लेकिन जन का मत किसी को भी सिर पर बैठा सकता और किसी को फर्श पर भी ला पटकता है। 2013 के चुनाव में चारों सीटें भाजपा के खाते थी। इस बार चुनाव में भाजपा के सामने इन सीटों को बचाने की चुनौती थी।
इसके लिए पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने सवाईमाधोपुर व गंगापुरसिटी में सभाएं की। पार्टी प्रदेशाध्यक्ष से लेकर आधा दर्जन से ज्यादा नेताओं के दौरे हुए। सीएम की भी सभाएं हुई। जी तोड़ कोशिश की गई। इसके बावजूद वह एक भी सीट बचा नहीं पाई। भाजपा एवं पार्टी प्रत्याशियों के लिए अब ये मंथन का विषय होगा। इसके विपरीत कांग्रेस की पूरे चुनाव में एक सभा सवाईमाधोपुर में हुई। वह भी सिर्फ सचिन पालयट की। इसके बावजूद तीन सीटों पर कब्जा हासिल किया।
एक निर्दलीय जो जीते वे भी कांग्रेस के ही थे। अब उनके भी कांग्रेस में ही शामिल होने के आसार है। सवाईमाधोपुर सीट पर दीया का टिकट कटने से ये सीट भाजपा के लिए खतरे में साबित हो रही थी। क्योंकि दीया जैसी छवि वाले जनप्रतिनिधि को जनता तलाश रही थी, वह कहीं दिखाई नहीं दी। ऐसे में जनता ने भाजपा प्रत्याशी को नकार दिया। यहां कांग्रेस से दानिश अबरार को क्षेत्र में पांच साल सक्रिय रहने का फायदा मिला। जातिगत समीकरण भी उनके पक्ष में रहे। जो उनकी जीत में सहयोगी बना।
खण्डार में भी विकास के बूते संसदीय सचिव जितेन्द्र गोठवाल वैतरणी पार लगाने की जुगत में थे, लेकिन यहां भी सरकार के खिलाफ नाराजगी के स्वर जनता के मन में उठे। ये ही वजह है कि विकास कार्य कराने के बाद भी उनको हार का मुंह देखना पड़ा। इस सीट पर पूर्व मंत्री अशोक बैरवा ने अपने अनुभव का फायदा उठाते हुए जीत दर्ज की। वहीं चौथी बार विधायक बनने का तोहफा मिला। गंगापुरसिटी में कांग्रेस प्रत्याशी भले ही हार गए, लेकिन वहां भी कांग्रेस की एक तरह से जीत हुई है। वह भाजपा प्रत्याशी मान सिंह को हराने में कामयाब रही है। वहीं निर्दलीय विजय प्रत्याशी रामकेश मीणा, जो कांग्रेस से बागी थे। उनके भी अब कांग्रेस में ही शामिल होने के आसार है।
ऐसे में यहां कांग्रेस को यहां भी खोने के लिए कुछ नहीं है। बामनवास क्षेत्र में जनता ने वंशवाद को नकार दिया। भाजपा ने निवर्तमान विधायक कुंजीलाल के बेटे को राजेन्द्र मीणा पर दावं खेला था। वह भी नहीं चला। यहां की जनता से 51 साल में पहली बार इतिहास रचा। पहली बार महिला इंदिरा मीणा पर भरोसा जताया। अब चुनौती की गेंद कांग्रेस के पाले में है। वह किस तरह जन आकांक्षाओं पर खरा उतरती है।





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