जीत के सपने को पूरा करने में दिन-रात भागदौड़ : नींद का समय हो गया कम
24 में से 20 घंटे एक्टिव रहते हैं अभी नेताजी, नींद तो छोड़ो, अभी आराम भी नहीं करते
अल सुबह मैदान में जाने को तैयार
बाड़मेर . राजनीति के घमासान में जीत की चाह में जुटे नेता दिन-रात दौड़-धूप में लगे हैं। बस इस बार जीत जाएं, यह सपना पूरा करने में न खाने की चिंता है न नींद की। आठ घंटे की नींद सिमट कर 2-3 घंटे तक की हो गई है। प्रत्याशी देर रात तक जनसंपर्क और दौरों में बीता रहे हैं। वहीं सुबह तड़के जल्दी उठ जाते हैं और पूरे दिन बैठकों और जीत के लिए जोड़-तोड़ में बीताते हैं। आराम अभी कोसों दूर हो गया है।
बाड़मेर जिले में कहीं त्रिकोणीय संघर्ष हैं तो कहीं पर कांटे की टक्कर। बागियों को साधने की कोशिशें अभी भी जारी हैं। वहीं भितरघात का असर कम करने में नेताजी हर किसी की बात सुन रहे हैं। छोटे से छोटे नेता भी अभी नेताजी से मिलने के लिए पहुंचते हैं तो उनको भी तवज्जो मिल रही है। अल सुबह से मध्य रात्रि के बाद तक दौरों और सभाओं के बावजूद थकान का कोई नामोनिशान नहीं है। धुुंआधार प्रचार से लौटने के बाद पूरी सक्रियता के साथ अगले दिन की रणनीति और प्रचार के तरीकों के साथ समीकरणों पर मंथन भी रात में चलता रहता है।
रात में रूठों को
मनाने का दौर
पूरे दिन सभाओं और दौरों के बाद नेताजी रात को रूठों को मनाने पहुंचते हैं। दिनभर
तो बैठकों और भाषणों को देते हैं। देर रात लौटने के बाद
रूठों को मनाने की जुगत में लगते हैं और उनके घरों तक पहुंच रहे हैं।
करवटों में निकल
रही रात
कुछ प्रत्याशियों, समर्थकों से बातचीत में सामने आया कि पूरा दिन प्रचार और भाषण मे बीत रहा है। रात को भी समर्थकों से लंबी चर्चा चलती है। समर्थक खुद कहते हैं कि अब कुछ देर आपको नींद लेनी चाहिए। इसके बाद ही नेताजी कुछ देर सोते हैं।
24 में से 20 घंटे एक्टिव
नेताओं की दिनचर्या में 24 में से 20 घंटे से अधिक समय चुनाव के दौरे, सभाओं, भाषणों और चर्चा में बीत रहा है। परिवार को भी अभी समय कम ही दे पा रहे हैं। बस चुनाव जीतने की जुगत में लगे नेताजी अभी एक ही बात पर अधिक ध्यान दे रहे हैं। देर रात को घर लौटते हैं और अल सुबह निकल जाते हैं।
एक्सपर्ट कमेंट...
दिमाग ज्यादा एक्टिव हो गया है
&सामान्यत: चौबीस में 6-7 घंटे नींद बहुत जरूरी है। ऐसा नहीं होने पर चिंता, चिड़चिड़ापन और याददाश्त में कमी जैसी शिकायतें हो सकती हैं। इन दिनों में चुनाव प्रचार के कारण प्रत्याशियों और नेताओं का दिमाग ज्यादा एक्टिव हो गया है। दिमाग जीत के लिए दावं-पेच में उलझा हुआ है। लोगों की राजनेताओं से अपेक्षाओं में बढ़ोत्तरी हुई है तो नेताओं को उनको संतुष्ट करने की चिंता भी बढ़ी है। यह भी एक कारण चुनाव के दौरान तनाव को बढ़ा सकता है।
- डॉ. ओपी डूडी, मनोचिकित्सक, बाड़मेर





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