अश्वनी प्रतापसिंह @ राजसमंद. कभी कांग्रेस का गढ़ रही राजसमंद विधानसभा में भाजपा ने लगातार तीन बार जीत दर्ज कर समीकरण जरूर बदले हैं, लेकिन इस बार की चुनावी रंगत का रंग अलग ही चढ़ रहा है। पार्टी से बढक़र चेहरे की राजनीति ने इस मुकाबले को प्रदेश की हॉट सीटों में शामिल कर दिया है। चुनाव में पार्टी और मुद्दे गौण है, चेहरा आगे है। शहर से ज्यादा चुनावी रंगत गांव-ढाणियों में दिख रही है। छतों पर एक से अधिक पार्टियों के झंडे इस बात का संकेत हैं कि मतदाता किसी को निराश नहीं करना चाहते। बोलते भी हैं तो बहुत संभलकर, तोल-तोलकर, मानो आचार संहिता इनके बोलने पर भी लगी हो। हां जुबां पर कभी-कभी सरकार से आहत हुई उम्मीदों का दर्द, करेले सी कड़वाहट लेकर आ जाता है, तो कभी पूरी ही ख्वाहिशें शहद बनकर जुबान से टपक पड़ती हैं। इस बार भाजपा में कई चेहरे दावेदारी जताते दिखे, लेकिन पार्टी ने माहेश्वरी पर ही भरोसा जताया। कांग्रेस ने पूर्व जिला प्रमुख नारायणसिंह भाटी को मैदान में उतार मुकाबला रोचक बना दिया।
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विधानसभा क्षेत्र में झील के पानी का मुद्दा वर्षों से चला आ रहा है। शहर की पेयजल व्यवस्था व आसपास की अधिकतर खेती इसी पर निर्भर है। ऐसे में यहां की राजनीति में झील का अहम रोल है। एक दशक से राजनेता इसे भरने के प्रयास का डंका पीटते आए हैं, लेकिन हुआ कुछ नहीं। राजसमंद को जिला बने करीब २८ वर्ष हो गए, लेकिन आधुनिक सुख सुविधाओं के लिए यह आज भी उदयपुर पर निर्भर है। मेडिकल, इंजीनियरिंग कॉलेज नहीं है, रोजगार के सीमित साधन इसके विकास की अधूरी कहानी बयां करते हैं। चुनावी मिजाज में तरसिंगड़ा के डालूदास खूब व्यंग करते हैं। डालू के घर चौखट जरूर लगी है, लेकिन दरवाजे नहीं है। विधवा बेटी भी और उसके पांच बच्चों का भार भी इनके सिर है। डालू से जब पूछा कि चुनाव का मिजाज कैसा है, तो वह सत्कार भाव से चारपाई रखते हुए बोले, साहब हम तो करोड़पति हैं, हमें चुनाव से क्या लेना-देना? सरकार बनने के बाद कोई आता है? जब हम फटेहाली लेकर जाते हैं तो जवाब मिलता है, आपके सैकड़ों बीघा भूमि है, करोड़पति हो, तुम्हें बीपीएल होने की क्या जरूरत? ऐसी सरकार का क्या फायदा जिसे लोगों का दर्द नहीं दिखाई दे। पास ही बैठे किशन भील ने भी ऐसा ही दर्द सुनाया। बाघपुरा नहर के पास चाय की दुकान पर चुनावी रंगत दिखी। यहां 10-12 लोग चाय पी रहे थे। पांच-छह युवा पार्टी विशेष का प्रचार कर रहे थे। आगे बढऩे पर खाखरमाला में एक युवा सिर पर पानी की मटकी रखे चला आ रहा था। पूछा वोट है या नहीं। बोला वोट नहीं है। उसने जो टीशर्ट पहन रखी थी, वह पार्टी विशेष की थी, पूछा घर में चुनावी रुझान क्या है। वह बोला टीशर्ट पर मत जाइए, ये तो मांगकर लाया हूं। वोट तो सोचकर देंगे। खाखरमाला के पास रोड किनारे ही एक किराणे की दुकान पर तीन लोग चर्चा कर रहे थे। पूछने पर कि क्या माहौल है, वे बोले पार्टी के लोग आ रहे हैं। वोट तो चेहरे और विकास के वादे पर निर्भर करता है।
विधानसभा प्रोफाइल
- कुल मतदाता: 211769, 1078 36 महिला मतदाता- 103933
यहां 2008 में भाजपा की किरण माहेश्वरी जीतीं।
वोट प्रतिशत
कांग्रेस: 42.38 प्रतिशत
भाजपा: 47.12 प्रतिशत
यहां 2013 में भाजपा की किरण माहेश्वरी जीतीं।
कांग्रेस: 31 प्रतिशत
भाजपा:50 प्रतिशत
दोनों प्रत्याशी का हाल क्या है
नारायणसिंह भाटी (कांग्रेस)
ताकत: स्थानीय प्रत्याशी, साफ छवि, मिलनसार व्यक्तित्व। पूर्व जिला प्रमुख, आमजन में पकड़।
कमजोरी: लम्बे समय से पार्टी में निष्क्रिय रहे हैं, बैठकों आदि में कम नजर आए हैं, इससे युवाओं में पहचान कम है।
किरण माहेश्वरी (भाजपा)
ताकत: साफ छवि, आमजन में गहरी पकड़, विधानसभा के प्रत्येक गांव में लगातार आवागमन।
कमजोरी: पार्टी में गुटबाजी होने से भीतरघात का अंदेशा।





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