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राजभवन को सिर्फ तिरंगे की चिंता, कुलपति से नहीं कोई मतलब

अजमेर.

राजभवन के लिए महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय में कुलपति से ज्यादा सौ फीट पर लहराता तिरंगा ज्यादा अहम है। एक ज्ञापन पर राजभवन से मिले प्रत्युत्तर से इसका खुलासा हुआ है। इसमें विश्वविद्यालय को तिरंगा फहराने की व्यवस्था करने को कहा गया है। जबकि कुलपति पद का जिक्र तक नहीं है।

विद्यार्थी कैलाश चौधरी ने पिछले दिनों राजभवन को एक ज्ञापन भेजा था। इसमें बताया कि विश्वविद्यालय में कुलपति नहीं होने से कामकाज प्रभावित हो रहा है। इसके अलावा परिसर में सौ फीट के पोल पर तिरंगा नहीं फहराया जाता है। राजभवन को ‘ कुलपति और तिरंगे ’ की तत्काल व्यवस्था करनी चाहिए।

कुलपति पद साधी चुप्पी

राजभवन के सचिव ने कैलाश चौधरी के ज्ञापन का प्रत्युत्तर भेजा है। पत्र कुलसचिव और अन्य अधिकारियों से होकर सामान्य प्रशासन विभाग में पहुंचा। इसमें कहा गया है कि विश्वविद्यालय को ज्ञापनकर्ता की मांग पर तत्काल सौ फीट पर तिरंगा फहराने की व्यवस्था करनी चाहिए। लेकिन कुलपति पद को लेकर राजभवन से मिले पत्र में कोई जिक्र नहीं है। ऐसा तब है जबकि पिछले ढाई महीने से कुलपति प्रो. आर. पी. सिंह के कामकाज पर रोक लगी हुई है। विश्वविद्यालय की सालाना परीक्षाओं, वित्तीय और प्रशासनिक कामकाज में जबरदस्त परेशानियां हो रही हैं।

पोल पर नहीं फहराते नियमित ध्वज
विश्वविद्यालय ने वर्ष 2017 में सौ फीट पोल लगाया था। नियमानुसार पोल पर तिरंगा नियमित फहराया जाना है। लेकिन उसी साल 5 और 6 दिसंबर को ओखी तूफान के चलते मौसम खराब रहा। एहतियात के तौर पर विश्वविद्यालय ने तिरंगा उतार दिया। इसी तरह पिछले साल मार्च में खराब मौसम और तेज हवाओं के चलते तिरंगा उतार दिया गया। उसके बाद से विश्वविद्यालय में एक-दो बार ही ध्वज फहराया गया है।

फहराने-उतारने की रस्म

भारत में प्राचीन काल से ध्वज को फहराने और उतारने की रस्म निर्धारित है। सतयुग और द्वापर युग से लेकर रियासतों के जमाने में सूर्योदय के साथ ध्वज फहराया जाता था। इस दौरान ढोल-नगाड़े, दुंदुभी या शहनाई बजाई जाती थी। इसी तरह सूर्यास्त होने से पूर्व ध्वज को इसी तरह सम्मानपूर्वक उतारा जाता था।



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