बांदीकुई. भले ही सरकार गाडिय़ा लुहारों को स्थाई रूप से बसाने के लिए प्रयासरत हो, लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर इन परिवारों के लिए संचालित योजनाए कागजों में ही दबकर सिमटती जा रही है। ऐसे में इन परिवारों की उम्मीदों पर पानी फिरता दिखाई दे रहा है।
जानकारी के अनुसार सरकार की ओर से घुमंतु/ अद्र्धघुमंतु इन गाडिय़ा लुहारों को सरकार की ओर से महाराणा प्रताप भवन निर्माण योजना के तहत प्रति परिवार भवन निर्माण के लिए 70 हजार रुपए तक अनुदान देय है। जबकि यदि ये परिवार कोई रोजगार करना चाहे तो उसके लिए 5 हजार रुपए कच्चे माल के लिए अनुदान देय है, लेकिन इन लोगों को योजनाओं की जानकारी नहीं होने से अभी तक एक भी परिवार लाभान्वित नहीं हो सका है।
इसका प्रमुख कारण इन परिवारों के पास राशनकार्ड, आधार कार्ड, पहचान पत्र एवं अन्य रिकार्ड नहीं होना है। जबकि ये लोग आए दिन ग्राम पंचायत एवं नगरपालिका कार्यालयों में राशनकार्ड जारी कराने के लिए भटकते दिखाई देते हैं, लेकिन इन्हें नियमों के दावपेच बताकर टरका दिया जाता है। हालांकि सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग की ओर से ऐसे घुमंतु एवं अद्र्ध घुमंतु गाडिय़ा लुहार परिवारों का सर्वे व चिन्हीकरण कर राशकनार्ड व अन्य कागजात जारी किए जाने के आदेश भी लम्बे समय पहले ही जारी हो चुके हैं, लेकिन अधिकारियों द्वारा ध्यान नहीं देने से से आदेश हवा में उड़ते दिखाई दे रहे हैं। इससे ये परिवार एक स्थान पर स्थाई रूप से स्थापित नहीं हो पा रहे हैं।
जबकि शहर के सिकंदरा रोड, पंचायत समिति के सामने, पण्डितपुरा रोड, गुढ़ाकटला, करनावर, पीचूपाड़ा खुर्द, भाण्डेड़ा रोड एवं आभानेरी सहित अधिकांश ग्राम पंचायत क्षेत्रों में ये गाडिय़ा लुहार डेरा डालकर तम्बू के नीचे रात गुजारते दिखाई दे रहे हैं। बताया जा रहा है कि दौसा जिले में करीब एक हजार से अधिक परिवार जगह-जगह डेरा डाले हुए हैं। हालांकि विभागीय अधिकारी कुछ परिवारों को जमीन आवंटन होने एवं राशनकार्ड जारी करने की बात कह रहे हैं। (ए.सं.)
छत भी नहीं हो रही नसीब
भाण्डेड़ा रोड पर बसे गाडिय़ां लुहारों ने गत दिनों पार्षद शक्तिसिंह राजावत के नेतृत्व में एसडीओ पिंकी मीणा को ज्ञापन सौंप योजनाओं से लाभान्वित कराएजाने की मांग की थी। गाडिय़ा लुहारों ने बताया कि उन्हें अभी तक जमीन तक आवंटित नहीं की गई है। सिकंदरा रोड पर डेरा डालकर जीवन यापन कर रहे गाडिय़ा लुहारों ने बताया कि वे कई बार नगरपालिका कार्यालय चक्कर काट चुके हैं, लेकिन अभी तक राशनकार्ड नहीं बना है और ना ही खाद्य सुरक्षा योजना में शामिल किया गया है। इससे परिवार के पालन पोषण का संकट बना हुआ है। इन दिनों तम्बुओं में सर्दी लगती है। जिन बच्चों की उम्र विद्यालय में पढऩे की है। वे गाडिय़ा लुहारों के बच्चे आर्थिक तंगी से जुझने से शिक्षा की मुख्य धारा से दूर होते जा रहे हैं। तम्बुओं में लाइट नहीं होने से अंधेरे में रहना पड़ता है। बच्चें भी कुछ दिन विद्यालय जाकर पढ़ाई छोड़ देते हैं। ये बच्चे इधर-उधर मजदूरी करते दिखाई देते हैं। कुछ बच्चे तो रेलवे स्टेशन पर भी भीख मांगते दिखाई देते हैं।





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