श्रीगंगानगर। नगर परिषद से करीब चंद कदम दूर और डा.बीआर अम्बेेडकर राजकीय महाविद्यालय के सामने शास्त्री बस्ती स्थित आश्रय स्थल पर ताले लटका हुआ था। वहां कोई भी कर्मचारी नहीं था। इस आश्रय स्थल के साथ पुराना आश्रय स्थल भी है जिसमें नगर परिषद का सहायक कर्मचारी परिवार के साथ पिछले कई सालों से रह रहा है।
ऐसे में नगर परिषद प्रशासन ने इस कर्मचारी को ही केयर टेकर की जिम्मेदारी भी दे रखी है लेकिन वह कभी कभार ही इस आश्रय स्थल की सुध लेता है। शास्त्री बस्ती स्थित इस आश्रय स्थल का अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की सचिव सुषमा पारीक ने जब चैकिंग की तो वहां कई खामियां मिली। इस अधिकारी ने वहां पाया कि वहां कोई कर्मचारी भी मौजूद नहीं था जो आंगुतकों को देख सके। यहां तक कि कोई रिकॉर्ड भी संधारित नहीं किया जा रहा था। टॉयलेट को कभी साफ तक नहीं किया गया था।
हालांकि वहां ठहरने के लिए बिस्तर और रजाईयों की व्यवस्था ठीक नजर आई। खानाबदोश और राहगीरों को इस आश्रय स्थल में ठहराने के लिए प्रचार प्रसार के लिए होर्डिग्स या बैनर तक नहीं लगे ताकि संबंधित लोगों को यह पता लग सके कि आश्रय स्थल कहां पर है।
इस न्यायिक अधिकारी की ओर से एक रिपोर्ट नगर परिषद को भिजवाई गई है। इस व्यवस्था के बावजूद यह स्थिति ज्यों की त्यों बनी हुई थी। एक और आश्रय स्थल अशोकनगर में है लेकिन वहां की व्यवस्थाओं के बारे में कोई फीडबैक नहीं लिया गया है। नगर परिषद में नलम की ओर से आश्रय स्थल में पर्याप्त बंदोबस्त कराया जाता है लेकिन इसका भी प्रचार प्रसार नहीं हो रहा है।
दरअसल करीब दस साल पहले सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर नगर परिषद प्रशासन ने वहां आश्रय स्थल का निर्माण करवाया था ताकि इस आश्रय स्थल पर राहगीर या बाहर से आने वाले मुसाफिर कडकड़़ाती ठंड में वहां रात को समय बीता सके। कई खानाबदोश लोगों को वहां ठहरने के लिए बकायदा नहाने और शौचालय सुविधा का बंदोबस्त किया गया था लेकिन नगर परिषद प्रशासन ने इसकी सार संभाल नहीं की। वहां अलाव के लिए लकड़ी भी रखवाई है लेकिन अलाव जलता कोई नहीं है।
वहीं पुरानी आबादी सुखवंत सिनेमा के पास आश्रय स्थल में स्थिति बेहतर है लेकिन वहां लोग सुविधा का फायदा नहीं उठाते। लोग राजकीय महाविद्यालय के सामने बने इस आश्रय स्थल पर अधिक होते थे लेकिन नगर परिषद प्रशासन ने इसका प्रचार प्रसार तक नहीं किया है।
दूसरी वजह भी बताई जा रही है कि मल्टीपरपज स्कूल के पास आरयूबी बनने के बाद यह आश्रय स्थल आरयूबी की ओट में आ गया है। इस कारण यह सामान्य तौर पर खानाबदोश लोगों को नहीं मिलता है।





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