जया गुप्ता/जयपुर . राज्य में उच्च शिक्षा मुफ्त करने की बात तो लंबे समय से हो रही है पर गंभीर प्रयास नहीं हुए हैं। राजस्थान पत्रिका ने पड़ताल की तो सामने आया कि प्रदेश में राज्य व केंद्र सरकारें उच्च शिक्षा में फीस पुनर्भरण पर सालाना 1000 करोड़ रुपए खर्च कर रही हैं। जबकि महज 11 करोड़ रुपए सरकार और दे तो पूरी कॉलेज शिक्षा मुफ्त हो सकती है। इससे राजस्थान नजीर बन सकता है।
साथ ही छात्रवृत्तियां बांटने में आए दिन सामने आने वाले घोटालों पर लगाम भी लगा सकता है। प्रदेश में उच्च शिक्षा में करीब 21 प्रकार की छात्रवृत्ति योजनाएं संचालित हैं। इनमें से करीब 8 योजनाओं में तो केवल फीस का पुर्नभुगतान किया जा रहा है। इनमें से कई योजनाओं में पुर्नभुगतान निजी कॉलेजों व विश्वविद्यालयों, तकनीकी शिक्षा के लिए भी हो रहा है।
इन योजनाओं में हो रहा फीस का पुनर्भुगतान
- अनुसूचित जनजाति उत्तर मैट्रिक छात्रवृति योजना।
- अन्य पिछड़ा वर्ग उत्तर मैट्रिक छात्रवृति योजना।
- विशेष पिछड़ा वर्ग उत्तर मैट्रिक छात्रवृति योजना।
- अनुसूचित जाति उत्तर मैट्रिक छात्रवृत्ति योजना।
- डॉ. अम्बेडकर आर्थिक पिछड़ा वर्ग उत्तर मैट्रिक छात्रवृत्ति योजना।
- विधवा/ परित्यक्ता मुख्यमंत्री (बीएड) सम्बल योजना।
- मुख्यमंत्री उच्च शिक्षा छात्रवृत्ति योजना।
(इन 7 योजनाओं में सरकार सालाना 1000 करोड़ रुपए कॉलेज विद्यार्थियों को देती है)
किस वर्ग से कितनी फीस ले रहे
कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में उच्च शिक्षा में लड़कियों को मुफ्त शिक्षा देने का वादा किया जबकि प्रदेश में सरकारी विश्वविद्यालयों व कॉलेजों में यूजी-पीजी में लड़कियों को पहले से ही फ्री शिक्षा दी जा रही है। लड़कियों के साथ आरक्षित वर्गों के लड़कों को भी शिक्षा मुफ्त मिल रही है। केवल अनारक्षित वर्गों के लड़कों से फीस ली जा रही है। यह फीस भी बहुत कम है। कॉलेजों में यूजी-पीजी के लिए केवल 200-250 रुपए व विश्वविद्यालयों में 2-3 हजार रुपए सालाना फीस है। इसे माफ करने से सरकार पर ज्यादा आर्थिक भार नहीं पड़ेगा।
जर्मनी में मुफ्त है शिक्षा
मुफ्त शिक्षा के मामले में जर्मनी आगे है। वहां सरकारी शिक्षण संस्थानों में किसी भी विद्यार्थी से ट्यूशन फीस नहीं ली जाती। दूसरे देशों से जाने वाले विद्यार्थियों को भी केवल प्रशासनिक व सेमेस्टर फीस देनी पड़ती है। हालांकि निजी संस्थानों में फीस लागू है।
सरकार पर आएगा कितना भार
राज्य के सरकारी कॉलेजों में 4 लाख और विवि में एक लाख यानी कुल 5 लाख विद्यार्थी हैं। इनमें से आरक्षित वर्ग के विद्यार्थियों, लड़कियों व 75 प्रतिशत अंक वाले छात्र-छात्राओं के लिए शिक्षा मुफ्त है।
कॉलेज : शिक्षण शुल्क महज 250 रुपए प्रतिवर्ष है। कुल 4 लाख विद्यार्थियों में से 1.25 लाख लड़कियों, 50 प्रतिशत आरक्षित वर्ग यानी 1.45 लाख आरक्षित छात्र-छात्राओं, 75 प्रतिशत से अधिक नंबर वाले 40 प्रतिशत यानी 52000 विद्यार्थियों के लिए शिक्षा मुफ्त है। शेष केवल 78 हजार विद्यार्थियों से 250 रुपए सालाना के हिसाब से 1.95 करोड़ रुपए शिक्षण शुल्क लिया जा रहा है।
विश्वविद्यालय : विवि में कुल 1 लाख विद्यार्थियों में से 70 हजार लड़कियों व आरक्षित वर्ग की शिक्षा मुफ्त है। शेष 30 हजार विद्यार्थियों से शिक्षण शुल्क (यूजी-पीजी) 3 हजार प्रतिवर्ष के हिसाब से कुल 9 करोड़ शिक्षण शुल्क लेते हैं।
(यानी कॉलेजों-विवि में सालाना केवल 11 करोड़ रुपए शिक्षण शुल्क लिया जा रहा है। सरकार 1000 करोड़ के साथ 11 करोड़ रुपए और देने का प्रावधान कर दे तो सभी को मुफ्त शिक्षा मिल सकती है)
इनका कहना है
हां, सरकारी शिक्षण संस्थानों में तकनीकी, मेडिकल व प्रोफेशनल पाठ्यक्रमों को छोड़कर सामान्य यूजी-पीजी में फ्री शिक्षा पर विचार किया जा सकता है। भंवर सिंह, उच्च शिक्षा राज्य मंत्री
विचार अच्छा है लेकिन यह सरकारी संस्थानों में ही लागू किया जा सकता है। सरकारी में ट्यूशन फीस वैसे भी बहुत कम है। सरकार ट्यूशन फीस माफ कर शिक्षा मुफ्त कर दे तो देश में हम नजीर बन सकते हैं।
प्रो. बीएल वर्मा, पूर्व कुलपति, कोटा विश्वविद्यालय





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