आम चुनाव की तारीख करीब आते ही राजनीतिक दलों में किसानों और बेरोजगार नौजवानों के लिए चिंता बढ़ गई प्रतीत हो रही है। कर्ज के महाजाल में फंसे किसानों और रोजगार हासिल करने में नाकाम साबित हो रहे युवाओं को अपनी तरफ आकर्षित करना चुनावी राजनीति का एक वैसा ही जरूरी पाठ हो गया है, जैसे सालभर पढ़ाई न करने वाले छात्रों के लिए परीक्षा-कुंजी का रट्टा लगाना होता है। पिछले आम चुनावों में भाजपा ने इन्हीं दोनों मोर्चों पर यूपीए सरकार की नाकामी का रोना रोते हुए अप्रत्याशित बहुमत हासिल किया था। किसानों की आमदनी दोगुनी करने और प्रतिवर्ष दो करोड़ रोजगार पैदा करने के वादे के साथ सत्तासीन हुई एनडीए की नरेंद्र मोदी सरकार ने 2019 की परीक्षा से पहले फिर किसानों की आमदनी दोगुनी करने और रोजगार के नए अवसर पैदा करने से संबंधित घोषणाएं शुरू कर दी हैं।
ताजा घोषणा कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने की है। उनका कहना है कि इस बार का बजट किसानों को समर्पित होगा। सरकार ने 2022 तक उनकी आय दोगुनी करने का लक्ष्य रखा है। दूसरी घोषणा रेल मंत्री पीयूष गोयल ने की है कि अगले दो साल में रेलवे में चार लाख लोगों को नौकरियां मिलेंगी। ये घोषणाएं ऐसे समय हो रही हैं, जब इन मोर्चों पर विफलता को विपक्ष लगातार मुद्दा बना रहा है। हाल ही में राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा अपनी सत्ता गंवा चुकी है और आगामी आम चुनावों में भी किसानों और बेरोजगारों की नाराजगी का असर दिखने का अंदेशा होने लगा है।
इसमें कोई शक नहीं कि लोक-लुभावन घोषणाएं तात्कालिक रूप से अच्छी लगती हैं और अमल में आने पर भी उनका फौरी लाभ ही मिल पाता है। जब तक कोई नीतिगत संरचना विकसित न हो और सरकार की मंशा साफ नजर न आए, समस्या का स्थायी हल नहीं हो सकता। ऐसा लगता है कि किसानों को राहत देने के लिए सरकारों के पास कर्जमाफी के अलावा और कोई रास्ता नहीं है, जबकि स्वामीनाथन समिति की सिफारिशों को लागू करके सरकार चाहे तो स्थायी समाधान की ओर बढ़ सकती है। कृषि क्षेत्र में नीतिगत संरचनात्मक विकास न होने का ही नतीजा है कि किसानों को सब्जियों की कीमतें इतनी कम मिल रही हैं कि उन्हें मवेशियों का चारा बनाना ज्यादा मुफीद लग रहा है। फसलों का अपेक्षित दाम न मिल पाना एक ऐसी समस्या है जिसका समाधान सरकारें नहीं निकाल पा रही हैं।
बाजार आधारित व्यवस्था में संभवत: यही एक क्षेत्र है जिसमें उत्पादक अपने उत्पाद की कीमत तय नहीं कर पाता है। दरअसल, विश्वबैंक से दिशाप्राप्त विकास के वर्तमान मॉडल में कृषि क्षेत्र का औद्योगीकरण ही लक्ष्य है। 'कॉरपोरेट फार्मिंग' नया शिगूफा है जिसे तेजी से स्थापित किया जा रहा है। इसके लिए रियायतें और नीतियां सामने आ रही हैं और परंपरागत खेती को ठिकाने लगाया जा रहा है। इससे जीडीपी भले ही बढ़ जाए, पर रोजगार कम ही होंगे। कहना होगा कि पिछले चुनाव में उम्मीद जगाने के बावजूद मंशा साफ न होने के कारण मोदी सरकार ने कृषि क्षेत्र में सुधार और बड़ी संख्या में रोजगार पैदा करने के अवसर गंवा दिए हैं। डराने वाली बात यह है कि विपक्ष के पास भी कोई नया रोडमैप नहीं है।





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