-कर्ज का बोझ भी होने लगा हल्का
श्रीगंगानगर। भाव की तुलना में उत्पादन लागत कम होने से नरमा-कपास की फसल से मोह भंग हुआ तो किसानों ने विकल्प के रूप में गाजर को चुना और आज इस गांव का हर किसान गाजर का उत्पादन कर रहा है। यहां के देखादेखी पड़ोसी राज्य पंजाब के फाजिल्का जिला के किसान भी गाजर की खेती करने लगे हैं।
गाजर की खेती में बीज का ही खर्चा होता है। उसके बाद न तो इसमें उर्वरक की जरूरत होती है और न ही महंगे कीटनाशकों के छिडक़ाव की। इसके विपरीत नरमा-कपास की खेती करने पर किसान का बीज, उर्वरक और कीटनाशकों पर इतना खर्चा हो जाता है कि प्रति बीघा दस-पंद्रह हजार रुपए की बचत मुश्किल से होती है।
नरमा-कपास की तुलना में गाजर की खेती बढऩे से खेतों में कीटनाशक का उपयोग घटा है, जिससे किसानों की सेहत में सुधार हुआ है। इससे उत्पादन लागत कम होकर मुनाफा बढऩे से किसान कर्ज के बोझ से भी मुक्त हुए हैं। साधुवाली के नाम से मशहूर गाजर की खेती अब 15 हजार बीघा में होने लगी है। पंजाब के किसान भी अपनी गाजर बेचने इसी गांव में आते हैं।
चालीस साल पहले हुई शुरुआत
गाजर की खेती की शुरुआत 1978 हीरालाल मलेठिया ने पंजाब से बीज लाकर की। उसके बाद गोपालराम भादू, बनवारीलाल सहू, शंकरलाल पंवार, हरचंद गोदारा और बुधराम बिश्नोई ने इसकी खेती को अपनाया। इन परिवारों की तीसरी पीढ़ी आज गाजर का उत्पादन कर रही है।
बुधराम बिश्नोई के पौत्र अमरसिंह बिश्नोई ने बताया कि जब गाजर की शुरुआत हुई तब एक बीघा भूमि की कीमत थी दो हजार रुपए और इतनी भूमि पर गाजर होती थी पंद्रह हजार की। गाजर का उत्पादन करने वाले किसान को वर्तमान में खर्चा निकाल कर 40 हजार रुपए की कमाई प्रति बीघा हो रही है। एक बीघा में लगभग 125 क्विंटल गाजर का उत्पादन हो जाता है।





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