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सवर्ण आरक्षण: आसान नहीं मोदी सरकार की राह, इन बाधाओं को दूर करने पर सवर्णों को मिलेगा इसका लाभ

नई दिल्‍ली। मोदी कैबिनेट ने सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण देने की घोषणा की बड़ा सियासी दांव खेल दिया है। कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दलों तत्‍काल इसकी काट नहीं निकाल पा रहे है। यही वजह है कि इस मुद्दे पर सियासी दल फूंक फूंककर कदम रख रहे हैं। लेकिन मोदी सरकार के लिए सवर्णों को आरक्षण दिला पाना इतना आसान भी नहीं है। इसे दांव को अमलीजामा पहनाने के लिए सरकार को कई बाधाओं को पार करने होगें।

1. कानूनी प्रक्रिया
ऐसा इसलिए कि सरकार को न केवल विधायी प्रक्रियाओं को पूरा करने बल्कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों को धारहीन बनाने में काफी मशक्‍त करनी पड़ेगी। अब अहम सवाल यही है कि क्‍या मोदी सरकार इतने बड़े सियासी दाव खेलकर भाजपा की चुनावी नैया को पार लगा पाएगी। जानकारों की मानें तो मोदी सरकार के लिए आगे की राह कांटों भरा है। इसके बाजवूद अगर मोदी सरकार आरक्षण के दाव को खेल गई तो भाजपा के लिए यह गेमचेंजर साबित हो सकता है।

2. संविधान संशोधन
सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण देने को लेकर सरकार आज लोकसभा और राज्‍यसभा में संविधान संशोधन बिल पेश कर सकती है। राज्‍यसभा का सत्र एक दिन के लिए बढ़ा दिया गया है। संसद को संविधान में संशोधन और कानून बनाने का अधिकार है। बहुमत के दम पर सरकार को ऐसा करने का भी अधिकार है। लेकिन इसकी भी अपनी एक प्रक्रिया है जिसे पूरा करना सरकार के लिए इतने कम समय असंभव जैसा है। फिर संविधान के अनुच्‍छेद 15 और 16 में परिवर्तन करने के लिए विपक्षी दलों को चुनावी मौसम में राजी करना आसान नहीं होगा।

3. विपक्ष का रुख
भले ही सरकार सवर्णों को आरक्षण दिलाने को लेकर लोकसभा और राज्‍यसभा में संविधान संशोधन बिल पेश कर ले। लेकिन इसको लेकर संसद में हंगामा होना तय है। ऐसा इसलिए कि विपक्षी दलों ने मोदी सरकार के इस निर्णय का प्रत्‍यक्ष रूप से विरोध करने के बदले इसकी राह में कानूनी रोड़ा अटकाने का काम करेगी। ऐसा इसलिए कि इस मामले में विपक्ष सवर्ण मतदाताओं को नाराज नहीं करना चाहेगी। इसके लिए विपक्षी दल यह सवाल उठा सकते हैं कि 10 फीसदी आरक्षण देना का आधार क्‍या है। क्‍या सरकार ने आरक्षण की सीमा तय करने के लिए आयोग का गठन किया। जैसा कि ओबीसी के मामले में हुआ था। अगर सरकार आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर सवर्णों को आरक्षण देना चाहती है कि तो सिखों, इसाईयों, जैनियों, बुद्धों व अल्‍पसंख्‍यक वर्गों के पिछड़े लोगों को भी इसमें शामिल क्‍यों नहीं किया गया। सरकार ने इस मुद्दे पर विपक्ष से चर्चा क्‍यों नहीं की।

4. समीक्षा का अधिकार
सरकार संविधान की नौवीं अनुसूची का सहारा लेकर कानून संसद में बिल पास करा भी लेती है तो भी उसका टिकना मुश्किल है, क्‍योंकि ऐसा करने पर शीर्ष अदालत को समीक्षा करने का अधिकार होगा । इसके खिलाफ लोग सुप्रीम कोर्ट में अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं। याचिकाएं दायर की जाएंगी। शीर्ष अदालत इसकी समीक्षा कर अपना निर्णय देने के स्‍वतंत्र है।

5. 50 फीसदी की लक्ष्‍मण रेखा
सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण के लिए अधिकतम कोटा 50 फीसदी तय कर रखा है। मोदी सरकार ने जिस तरीके से सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण देने की बात की है उससे साफ है कि यह आंकड़ा सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित लक्ष्‍मण रेखा को पार कर जाएगी। तय है कि यह मामला न्यायिक समीक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट के सामने जाएगा। वहां इस फैसले का टिकना मुश्किल है। सुप्रीम कोर्ट ने 1992 में इंदिरा साहनी फैसले कोटे की अधिकतम सीमा 50 फीसदी तय की थी। सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की बेंच ने ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि आरक्षण की सीमा 50 फीसदी को पार नहीं सकती।



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