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VIDEO मौसम की मार से बचाएं सौंफ की फसल, किसान इन बातों का रखे ध्यान...

सिरोही. जिले में सौंफ की फसल लहलहा रही है। सर्द हवा के साथ महक वातावरण में घुली है। अभी बीमारी का प्रकोप नहीं है पर मौसम में बदलाव के चलते सावधानी रखने की जरूरत है। शुष्क एवं सामान्य ठंडा मौसम विशेषकर जनवरी से मार्च तक इसकी उपज व गुणवत्ता के लिए फायदेमंद है। फूल आते समय लम्बे समय तक अधिक बादल या अधिक नमी से बीमारियों का प्रकोप को बढ़ावा मिलता है।
सौंफ की खेती कई राज्यों में की जाती है। यह मसाले की प्रमुख फसल है। सिरोही, आबूरोड समेत आसपास के काश्तकार सौंफ की ज्यादा बुवाई करते हैं। बार-बार बदलते मौसम में सौंफ की फसल में कई रोग लग जाते हैं जिससे उत्पादन के साथ गुणवत्ता भी गिर जाती है। मंडी में दाम भी कम मिलते हैं। मावठ की स्थिति में फसल में कालिया रोग का खतरा बना रहता है। दाने पर काले धब्बे पड़ जाते हैं। सौंफ का उपयोग आचार बनाने और सब्जियों में जयका बढ़ाने में किया जाता है। इसके औषधि गुण भी हैं।

कृषक की जुबानी
मूलरूप से गुजरात से आए किसान आबिद अली ने बताया कि इस फसल में मेहनत ज्यादा है। सिरोही में खेत लीज पर लिया है और करीब 20 बीघा में सौंफ की फसल बोई है। अभी कुछ फसल पकी है तो कुछ में फूल आए हैं। फसल करीब सात माह में तैयार होती है। इसमें रोगों का प्रकोप भी ज्यादा होता है। नमी युक्त मौसम इसके लिए जहर है। कालिया, मैला, झुलसा आदि रोग फसल बरबाद कर देते हैं। वर्षा की कमी के कारण बुवाई कम हो पाई है। इसमें सिंचाई की जरूरत ज्यादा होती है। अभी तीन-चार घंटे में कुएं का पानी टूट जाता है। हर साल कालिया रोग लगने से उम्मीदों पर पानी फिर रहा है। इसके पकने की अवधि लम्बी है। यहां मजदूर महंगे मिलते हैं। जून में इसे बोया जाता है। नवम्बर से शुरू होकर मार्च तक फसल पकती है। सौंफ में हर 10 दिन में पानी देना पड़ता है।

फसल कटाई
इसकी फसल की अभी कटाई चल रही है। यह एक साथ पूरी नहीं काटी जाती। बीज कुछ पीले होने पर ही कटाई करें। हालांकि इसके बीज का रंग हरा ही रहता है, इसलिए पहले एक डंडी को तोड़कर उसमें से बीज को निकालकर दोनों हाथों के बीच रगड़कर देखें कि ये पूरी तरह से पक चुके हैं या नहीं। इसके बाद ही फसल की कटाई करें। 10 दिनों के अंतराल पर दो या तीन बार कटाई की जाती है। खेत में घूमकर पके दाने देखे जाते हैं। फिर उन्हें भर कर विशेष झूपड़ी में ले जाया जाता है।

सुखाने की प्रक्रिया
सुखाने के लिए विशेष छप्पर खेत पर ही बनाया जाता है। फसल काटने के 8-10 दिन तक छाया में तो 1-2 दिन धूप में बांस की चटाई पर सुखाया जाता है। ज्यादा दिन धूप में सुखाने पर दाने की गुणवत्ता कम होने के साथ हरापन खत्म हो जाता है। सूखने के बाद इसे लकड़ी के डंडों से कूट कर निकाला जाता है।

सफाई और ग्रेडिंग
सूखने के बाद सौंफ की सफाई की जाती है। वैक्यूम, गुरुत्वाकर्षण विभाजक या सर्पिल गुरुत्वाकर्षण विभाजक यंत्र की मदद से साफ किए जाते हैं। वैसे सिरोही जिले में विभिन्न आकार की परम्परागत छलनी से साफ किया जाता है। आकार व गुणवत्ता के आधार पर ग्रेडिंग की जाती है। सूखे हुए साफ बीजों को जूट से बने बैग में पैक किया जाता है। इसके बाद इसे नमी रहित जगह में रखा जाता है। विक्रय के लिए ऊंझा मंडी ले जाया जाता है।

विशेषज्ञ की राय
पौधे की पत्तियां तोडें़
सिरोही में कृषि विभाग में उपनिदेशक जगदीश मेघवंशी का कहना है कि सर्दी बढऩे से पाला पड़ेगा। इससे कालिया रोग हो सकता है। इससे फसल को बचाने के लिए पौधे की जमीन से एक फुट तक की पत्तियां तोड़ देनी चाहिए ताकि पूरे पौधे को पर्याप्त हवा मिल सके। फसल में प्रति लीटर पानी के साथ 2 ग्राम मेंकोजेब का छिड़काव करना चाहिए। छिड़काव की ढोलकी में मेंकोजेब के साथ कार्बनडाइजीम भी मिलाना चाहिए। ऐसा छिड़काव सात से दस दिन तक करना पड़ता है। उचित जल निकासी भी सौंफ की फसल की व्यावसायिक खेती के लिए महत्वपूर्ण है। सहायक कृषि अधिकारी प्रतापराम दत्ता ने बताया कि फसल को आवश्यकता से अधिक पानी नहीं पिलाया जाए तथा जो पत्तियां जमीन को छू रही हैं उनको तोड़ दें जिससे कालिया रोग से बचा जा सकता है। सौंफ के दाने गुच्छों में आते हैं व एक ही पौधे के सब गुच्छे एक साथ नहीं पकते हैं अत: कटाई एक साथ नहीं हो सकती है जैसे ही दानों का रंग हरे से पीला होने लगे गुच्छों को तो? लेना चाहिए। सौंफ की उत्तम पैदावार के लिये फसल को अधिक पकाकर पीला नहीं प?ने देना चाहिए। सुखाते समय बार.बार पलटते रहना चाहिए तथा फंफूद लगने की संभावा रहती है। जब दानों का आकार पूर्ण विकसित हो तभी इनकी कटाई करनी चाहिए।



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