नई दिल्ली। पिछले साल जुलाई, 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने एलजी बनाम सीएम विवाद पर अहम फैसला दिया था। अपने फैसले में शीर्ष अदालत ने कहा था कि दिल्ली को चुनी हुई सरकार चलाएगी। असली ताकत मंत्रिपरिषद के पास है। उप-राज्यपाल तकनीकी तरीकों से बाधा नहीं डाल सकते। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि मंत्रिपरिषद के सभी फैसलों की जानकारी उप-राज्यपाल को देना जरूरी है लेकिन उनकी सहमति जरूरी नहीं है। पुलिस, कानून-व्यवस्था और जमीन से जुड़े मामले उप-राज्यपाल के पास ही रहेंगे।
इसके अलावा सभी मामलों में चुनी हुई सरकार कानून बना सकती है। किसी अहम मसले पर यदि कैबिनेट और उप-राज्यपाल एकमत न हो तो उसे राष्ट्रपति के पास भेजा जा सकता है। कुछ मामले केंद्र के पास भी जा सकते हैं। दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्ज मिलना मुमकिन नहीं है। इस फैसले से यह विवाद और पेचीदा हो गया। इसलिए आप भी जानिए इस विवाद से जुड़ी 10 बड़ी बातें।
1. न्यायमूर्ति एके सीकरी और जस्टिस अशोक भूषण का फैसला इस विवाद पर आ सकता है। ताकि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और केंद्र द्वारा नियुक्त उपराज्यपाल के बीच अधिकार क्षेत्र पर लंबे समय से चल रही लड़ाई शांत हो सके।
2. सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि सेवाओं, अफसरों के ट्रांसफर- पोस्टिंग और एंटी करप्शन ब्यूरो, जांच कमीशन के गठन पर किसका अधिकार? एक नवंबर, 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार और केंद्र की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था।
3. सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई 2018 के फैसले में कहा था कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं दिया जा सकता। मगर उप राज्यपाल के पास भी स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने का अधिकार नहीं है और उन्हें चुनी गई सरकार से परामर्श और सहयोग लेकर काम करना चाहिए।
4. आप की सरकार यह मानती है कि जनता द्वारा चुनी जाने के बावजूद राष्ट्रीय राजधानी के शासन में उसके अधिकार सीमित हैं। पिछले साल आम आदमी पार्टी की सरकार ने दिल्ली के लिए पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग उठाई थी।
5. शीर्ष अदालत ने कहा था कि उप राज्यपाल मंत्रिपरिषद के फैसले से भले न सहमत हों, मगर उनकीआपत्तियां बुनियादी मुद्दों पर होनी चाहिए और उसके पीछे तर्क होना चाहिए।
6. सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने अगस्त, 2016 में दिल्ली उच्च न्यायालय के उस फैसले को पलट दिया था, जिसमें कहा गया था कि केंद्र शासित प्रदेश होने के कारण दिल्ली की सभी शक्तियां केंद्र के पास हैं न कि राज्य सरकार के पास।
7. सुप्रीम कोर्ट ने कन्फ्यूजन दूर करने के लिए फैसले की विशिष्ट क्षेत्र के लिहाज से व्याख्या करने से इन्कार कर दिया। अब काफी समय बाद फिर से पार्टी शीर्ष अदालत से फैसले को और अधिक स्पष्ट करने की मांग को लेकर पहुंची है।
8. सुनवाई के दौरान केंद्र ने शीर्ष अदालत को बताया था कि उप राज्यपाल के पास दिल्ली में सेवाओं को विनियमित करने की शक्ति है। राष्ट्रपति ने अपनी शक्तियों को दिल्ली के प्रशासक को सौंप दिया है और सेवाओं को उसके माध्यम से प्रशासित किया जा सकता है। केंद्र ने यह भी कहा कि जब तक भारत के राष्ट्रपति स्पष्ट रूप से निर्देश नहीं देते तब तक एलजी, जो दिल्ली के प्रशासक हैं, मुख्यमंत्री या मंत्रिपरिषद से परामर्श नहीं कर सकते।
9. केंद्र ने अदालत से कहा था कि शीर्ष अदालत की संविधान पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा था कि दिल्ली को राज्य का दर्जा नहीं दिया जा सकता है। केंद्र ने कहा था कि बुनियादी मुद्दों में से एक यह है कि क्या राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार के पास सेवाओं को लेकर विधायी और कार्यकारी शक्तियां हैं या नहीं। दिल्ली सरकार ने पहले अदालत को बताया था कि उनके पास जांच का एक आयोग गठित करने की कार्यकारी शक्ति है।
10. 19 सितंबर को केंद्र ने शीर्ष अदालत से कहा था कि दिल्ली के प्रशासन को दिल्ली सरकार के पास अकेला नहीं छोड़ा जा सकता क्योंकि देश की राजधानी होने के नाते इसकी असाधारण स्थिति है।





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