नई दिल्ली। आज से रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर शक्तिकांत दास के कार्यकाल की पहली मौद्रिक समीक्षा बैठक शुरू हो रही है। इस बैठक में कई अहम मुद्दों पर चर्चा होगी, जिसमें से राजकोषीय मार्चे पर चुनौतियां और कच्चे तेल की कीमत प्रमुख है। हालांकि कच्चे तेल की कीमतों के बढ़ने से समिति के लिए नीतिगत ब्याज दर घटाना अभी संभव नहीं होगा।
पीयूष गोयल संबोधित करेंगे बोर्ड की बैठक
हाल ही में वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने किसानों से लेकर महिलाओं तक, मिडिल क्लास से लेकर उद्योग जगत तक, सबको ध्यान में रखते हुए अंतरिम बजट पेश किया था। अब मौद्रिक नीति समीक्षा के दो दिनों बाद यानी 9 फरवरी को कार्यवाहक वित्त मंत्री पीयूष गोयल रिजर्व बैंक के केंद्रीय बोर्ड की बैठक को संबोधित करते हुए अंतरिम बजट के मुख्य बिन्दुओं को रेखांकित कर एक और बड़ा ऐलान कर सकते हैं। बैठक में वर्तमान वित्त वर्ष के लिए अंतरिम लाभांश के सरकार के अनुरोध पर भी विचार किया जा सकता है। आपको बता दें कि बैंक पहले ही चालू वित्त वर्ष के लिए 40,000 करोड़ रुपए के लाभांश का भुगतान कर चुका है।
उर्जित पटेल की अगुवाई में हुई थी पिछली बैठक
आरबीआई की पिछली समीक्षा बैठक दिसंबर में उर्जित पटेल की अगुवाई में हुई थी। उस बैठक में कई अहम निर्णय लिए गए थे। दिसंबर महीने में जो मौद्रिक समीक्षा बैठक हुई थी, उसमें केंद्रीय बैंक ने बेंचमार्क ब्याज दर यानी रेपो रेट 6.5 फीसदी पर स्थिर रखी थी और रिवर्स रेपो रेट 6.25 फीसदी पर यथावत रखी गई थी। बैठक में लिए गए निर्णय के बाद उर्जित पटेल ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। पटेल के इस्तीफे के बाद शक्तिकांत दास ने 12 दिसंबर को आरबीआई की कमान संभाली थी।
6.24 लाख करोड़ रुपए हो सकता है राजकोषीय घाटा
बता दें कि अक्टूबर-दिसंबर तिमाही के दौरान खुदरा मुद्रास्फीति रिजर्व बैंक के 3.8 फीसदी के अनुमान से कम 2.6 फीसदी रही। वहीं केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा चालू वित्त वर्ष के पहले नौ महीनों में 7.01 लाख करोड़ रुपए रहा थी। बात अगर वर्ष 2018- 19 की करें तो इसमें राजकोषीय घाटा 6.24 लाख करोड़ रुपए रहने का अनुमान लगाया गया है। सरकारी आकड़ों के अनुसार ये बताया जा रहा है कि रेवेन्यू वसूली की रफ्तार कम होने से घाटे का आंकड़ा बढ़ गया है।
rbi के पास नीतिगत रुख बदलने का मौका
इस संदर्भ में बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री समीर नारंग ने कहा कि, 'बैठक में आरबीआई नीतिगत रुख को तटस्थ कर सकती है।' उनका कहना है कि, 'मुद्रास्फीति में उल्लेखनीय कमी के अलावा वैश्विक वृद्धि सुस्त पड़ने से 2018-19 में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति चार फीसदी के दायरे में रहने वाली है। इससे रिजर्व बैंक के पास मौका बनेगा कि वह नीतिगत रुख बदले।'
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