वसंत की धानी चूनर पर पहली बार शहादत का रंग नहीं लगा...इससे पहले भी फरवरी के ही महीने में कोटा के लाल भारत भूषण पारोलिया मातृभूमि पर अपने प्राण न्यौछावर कर चुके हैं...शहीद हेमराज मीणा की तरह ही शहीद पारोलिया की सर्च पार्टी पर भी पुलवामा में ही फिदायिन हमला हुआ...जिसमें उनके साथ 11 जनाव शहीद हुए थे...वहीं सीआरपीएफ के जांबाज कमांडेंट चेतन चीता पर भी बांदीपोर के हाजिन इलाके में इसी महीने में हमला हुआ था...कोटा का यह लाल 16 गोलियां लगने और 40 दिन कौमा में रहने के बाद भी मौत को मात देकर घर लौटा आया।
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मुकाबले का भी नहीं मिला मौका
18 फरवरी 2000 के दिन इंटेलीजेंस को पुलवामा में पाक परस्त दशहतगर्दों के छिपे होने की खबर मिली। मौका गंवाए बिना सीआरपीएफ की 69वीं बटालियन के स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप ने जेएंडके पुलिस और सेना के साथ ज्वॉइंट सर्च ऑपरेशन लॉन्च कर दिया...। स्पेशल ऑपरेशन में महारथ रखने वाले कोटा के लाल और सीआरपीएफ के जवान भारत भूषण पारोलिया को पता था कि सेना के वाहनों को देख आतंकी उन्हें निशाना बनाने से बाज नहीं आएंगे...।
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एहतियातन सीआरपीएफ की 14 सदस्यीय एसओजी पुलवामा से कुछ दूर पहले अपनी गाडिय़ां छोड़ सिविल व्हीकल्स से आगे के लिए रवाना हुई...। बावजूद इसके आतंकियों को उनके मूवमेंट की भनक लग गई और आईडी ब्लास्ट कर सैनिकों से भरी गाड़ी को उड़ा दिया। इस हमले में कोटा के लाल भारत भूषण पारोलिया समेत 11 जवान मौके पर ही शहीद हो गए...। जबकि 3 गंभीर रूप से घायल हुए थे। आज ही के दिन इस जांबाज शहीद की पुण्यतिथि है।
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फिर हुआ कायराना हमला
14 फरवरी 2019 रोज की तरह ही रोड ओपनिंग पार्टी तड़के जम्मू-कश्मीर नेशनल हाईवे पर आईईडी और ब्लास्टिंग माइंस की तलाश कर वापस लौटी थी...। सीआरपीएफ ट्रांजिट कैंप में पोस्टिंग पर जाने को तैयार बैठे ढाई हजार से ज्यादा जवानों का काफिला हरी झंडी मिलते ही आगे बढऩे लगा...। मौसम खासा खराब था, जिसके चलते हाईवे पर सिविलि व्हीकल्स लगभग नदारद थे। यह काफिला जैसे ही श्रीनगर से 27 किमी पहले पुलवामा जिले के लाथोपोर इलाके में पहुंचा।
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विस्फोटक से भरी कार को काफिले से भिड़ा पाक परस्त आतंकियों ने कायरना हमला कर दिया। इस घातक हमले में कोटा के लाल सीआरपीएफ हवलदार हेमराज मीणा समेत करीब चार दर्जन से ज्यादा जवान शहीद हो गए। फरवरी के ही महीने में यह कोटा के सीने पर तीसरा घाव था...जिसमें सीआरपीएफ में तैनात कोटा के जांबाज सपूतों को निशाना बनाया गया।
दहाड़ उठा चीता
16 गोलियां लगने से पूरा जिस्म छलनी हो चुका था...ग्रेनेड के धमाके में दोनों हाथ की हड्डियां भी टूट गई...दहशतगर्दों की गोलियों ने दाईं आंख भी फोड़ दी...। फिर भी चीते की दहाड़ कम न हुई। बंदूक उठाई और एक ही गोली में लश्कर-ए-तैयबा के आतंकी कमांडर अबू हारिश को ढेर कर दिया। गोलीबारी थमी तो पता चला कि सीआरपीएफ की 92वीं बटालियन के जांबाज कमांडेंट चेतन चीता मौत से जूझ रहे हैं।
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आनन-फानन में एयर एम्बुलेंस से दिल्ली स्थित एम्स के ट्रोमा सेंटर में लाया गया। जहां दो दर्जन से ज्यादा ऑपरेशन और 40 दिन कौमा में रहने के बाद कोटा का लाल चीता फिर से दहाड़ उठा। उनकी असाधारण बहादुरी के लिए केन्द्र सरकार ने कीर्ति चक्र से सम्मानित किया। 14 फरवरी 2017 की सुबह कमांडेंट चीता को बांदीपोर जिले में आतंकियों के छिपे होने की जानकारी मिली। जिस पर वे 13 राष्ट्रीय रायफल और जम्मू कश्मीर पुलिस के स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप के साथ आतंकियों के नापाक इरादे नाकाम करने के लिए मौके पर जा पहुंचे।
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उन्हें गांव में घुसता देख आतंकियों ने गोलीबारी शुरू कर दी, लेकिन चीता बाकी साथियों को पीछे छोड़ आतंकियों को चकमा देते हुए उनके बेहद करीब जा पहुंचे। आतंकियों ने खुद को घिरा हुआ जान चीता को निशाना बनाकर गोलियां और ग्रेनेड दागे। इससे चीता गंभीर रूप से घायल हो गए। इसके बावजूद चीता ने लश्कर-ए-तैयबा के कमांडर अबू हारिश को मार गिराया। मौत को मात देने के बाद चेतन चीता एक बार फिर ड्यूटी पर लौट मातृभूमि की सेवा करने में जुटे हुए हैं।





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