अजमेर.
कुलपति की गैर मौजूदगी में डीन कमेटी गठन की परम्परा पर विश्वविद्यालय बेवजह चल रहे हैं। विश्वविद्यालयों के लिए साल 2017 में विधानसभा में पारित एक्ट में किसी कमेटी का जिक्र नहीं है। फिर भी कमेटी बनाई जा रही है।
उदयपुर के मोहनलाल सुखाडिय़ा विश्वविद्यालय ने कुलपति की गैर मौजूदगी में डीन कमेटी गठन की परिपाटी शुरू की थी। इसमें तीन या चार संकाय के डीन शामिल होते हैं। यह कमेटी कुलपति की अनुपस्थिति में सामान्य कामकाज करती है। इस परम्परा को प्रदेश के अधिकांश विश्वविद्यालय बेवजह अपनाए बैठे हैं। महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय भी इसमें शामिल हैं। यहां भी कई पूर्व कुलपति विदेश दौरे या खास कार्य के लिए बाहर जाने पर सामान्य कामकाज के लिए तीन सीनियर प्रोफेसर की कमेटी बनाते थे।
नए एक्ट में यह है प्रावधान
विधानसभा में विश्वविद्यालय (संशोधन) विधेयक-2017 पारित होने के बाद डीन कमेटी की व्यवस्था खत्म हो चुकी है। इसके अधिनियम की धारा 19 (10) के तहत कहा गया है कि किसी विश्वविद्यालय के कुलपति पद की कोई स्थाई रिक्ति, मृत्यु, त्यागपत्र, हटाए जाने, निबंलन के कारण या अन्यथा हो जाने पर उप धारा 9 के अधीन संबंधित विश्वविद्यालय के कुलसचिव तत्काल कुलाधिपति-राज्यपाल को सूचना भेजेंगे। इस अधिनियम के तहत कुलाधिपति सरकार से परामर्श कर किसी दूसरे विश्वविद्यालय के स्थाई कुलपति को अतिरिक्त दायित्व सौंपेंगे। संशोधित एक्ट में कुलपति को डीन कमेटी गठन जैसा कोई विशेषाधिकार नहीं दिया गया है।
डीन कमेटी पर उठे सवाल?
हाल में विश्वविद्यालय में परीक्षात्मक कार्यों के लिए राजभवन ने डीन कमेटी बनाई है। यह कमेटी सवालों के घेरे में है। अव्वल तो एक्ट में डीन कमेटी का प्रावधान नहीं है। तिस पर इसमें विभिन्न संकाय के डीन को ही शामिल किया जा सकता है। कार्यपालक अधिकारी होने के कारण कुलसचिव और वित्त नियंत्रक कमेटी में शामिल नहीं हो सकते हैं। ऐसा पहली बार है जबकि कमेटी में दोनों अधिकारियों को रखा गया है।
एक्ट की नहीं हो रही अनुपालना
नाम नहीं छापने की शर्त पर महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय के चार पूर्व कुलपतियों ने बताया कि प्रदेश के अधिकांश विश्वविद्यालयों ने उदयपुर के मॉडल को बेवजह अपना रखा है। जबकि सभी विश्वविद्यालयों के एक्ट, नियम, उपनियम पृथक हैं। कुलपति केवल अपनी ‘सुविधा’ के लिए डीन कमेटी गठित करते हैं। सीनियर प्रोफेसर कमेटी गठन की परम्परा भी संशोधित विधेयक लागू होने के बाद खत्म हो चुकी है। विधानसभा में पारित एक्ट की भी अनुपालना नहीं हो रही है।





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