प्रमोद अवस्थी
बांदीकुई. गृह रक्षा दल के जवान (होमगार्ड) जान को जोखिम में डालकर बखूबी से सौंपी गई जिम्मेदारियों का निर्वहन कर रहे हैं, लेकिन राज के रूठने से इन होमगार्डों की स्थाईकरण की उम्मीदें टूटती जा रही हैं। इसके चलते अभी तक नियमित पगार तक नहीं बंध पाई। ऐसे में इन जवानों के परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं। ऐसे में अब होमगार्ड निराश होकर नया रोजगार कर परिवार के पालन पोषण की जुगत में लगे हुए हैं, लेकिन सरकार का इस ओर कोई ध्यान नहीं है।
जानकारी के अनुसार राज्य में कुल ३० हजार ७१४ होमगार्ड कार्यरत हैं। इनमें दौसा जिले में ५ कंपनी हैं। इनमें करीब साढ़े ५ सौ होमगार्ड कार्यरत हैं, लेकिन प्रशासन की ओर से बनाए गए रोस्टर के हिसाब से एक होमगार्ड को वर्षभर में औसतन मात्र तीन से साढ़े तीन माह ड्यूटी पर लिया जाता है। ऐसे में होमगार्ड ९ माह ठाले बैठे रहते हैं। इन होमगार्डों को ड्यूटी करने का भुगतान भी नियत समय पर नहीं मिल पाता है। ऐसे में होमगार्डों के साथ ही उनके परिवारजनों को भी आर्थिक तंगी से जूझना पड़ रहा है। जबकि एक होमगार्ड को एक दिन का मेहनताना भी ६९३ रुपए प्रतिदिन देय है।
इसी कड़ी में गृह रक्षा विभाग की ओर से बडिय़ाल रोड पर गृह रक्षा प्रशिक्षण उपकेन्द्र भी खोल दिया गया है, लेकिन इस केन्द्र पर हमेशा ताला लटका रहता है। ऐसे में मजबूरन कोई गृह रक्षा दल का जवान सब्जी बेचकर तो कोई पौधे बेचकर व पानी के टैंकर चलाकर घर खर्च चला रहे हैं तो कोई जवान चौपहिया वाहन चलाकर घर का संचालन कर रहा है।
इन दिनों होमगार्ड रात्रि गश्त, यातायात व्यवस्था, आबकारी, संचार निगम, एफसीआई गोदाम सहित अन्य कार्यालयों में ड्यूटी दे रहे हैं। इसके अलावा इन होमगार्डों की चुनावों में भी ड्यूटी लगाई जाती है। राज्य के अलावा पंजाब एवं मध्यप्रदेश भी होमगार्डों को चुनाव में सुरक्षा व्यवस्था के लिए भेजा गया, लेकिन अब होमगार्डों की आस टूटती जा रही है। जबकि होमगार्डों की भर्ती में भी दौड़, मेडिकल एवं शिक्षा सहित अन्य मापदण्ड तय किए हुए हैं, लेकिन स्थाईकरण नहीं होने से मायूस होने लगे हैं।
हादसा हो जाए तो खींच लेते हैं हाथ
यदि किसी होमगार्ड के साथ कोई घटना हो जाए तो सरकार आर्थिक सहयोग के नाम पर हाथ खींच लेती है। गत वर्ष होमगार्ड कन्हैयालाल की हार्ट अटैक से मौत हो गई, लेकिन उसके परिवार को सरकार की ओर से कोई आर्थिक सहयोग भी नहीं दिया गया। इससे अब होमगार्ड असुरक्षित भी महसूस करने लगे हैं। जबकि होमगार्ड की ड्यूटी भी पुलिस की तरह होती है। अब उसका परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा है।
पांच बेटियों का कैसे हो पालन-पोषण
होमगार्ड कल्याणसहाय शर्मा ने बताया कि गत १९९९ में होमगार्ड में भर्ती हुआ। बीस वर्ष से स्थाई होने की उम्मीद बंधी थी, लेकिन लम्बे समय तक सरकार ने ध्यान नहीं दिया तो आर्थिक तंगी से जूझने लगे। वर्ष में मात्र तीन माह रोजगार मिलता है। जो कि ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रहा है। पांच बेटियां हैं। उनकी पढ़ाई एवं शादी सहित अन्य जिम्मेदारियां भी हैं। ऐसे में घर के पालन पोषण के लिए न्यायालय के बाहर चाय की थड़ी लगाकर घर का संचालन करना पड़ रहा है।
ड्यूटी के तीन माह बाद भी नहीं मिला वेतन
होमगार्ड दिनेश कुमार कन्नौजियां ने बताया कि वह बीस वर्ष से होमगार्ड की ड्यूटी कर रहा है। गत नवम्बर २०१८ तक आबकारी विभाग में ड्यूटी की। जिसका तीन माह बीत जाने के बाद भी मेहनताना नहीं मिला है। जबकि
पुलिस की तरह ही बखूबी से ड्यूटी करते हैं। मजबूरन कपड़ों की प्रेस करके परिवार का संचालन करना पड़ रहा है। पत्नी सिलाई-बुनाई करके सहयोग देती है। प्रशासन जरूरत पडऩे पर तत्काल ड्यूटी पर बुला लेता है। जान जोखिम में डालकर नौकरी करते हैं, लेकिन उनका कोई धणी-धोरी नहीं है।
मोटर बांधकर कर रहा हूं गुजारा
होमगार्ड कंपनी कमाण्डर दिनेशचंद सैनी ने बताया कि रोस्टर प्रणाली से ड्यूटी पर लगाया जाता है। ऐसे में ड्यूटी करने के बाद नौ माह ठाले रहते हैं। ऐसे में घर खर्च कैसे चले। इसके लिए बिजली की मोटर बांधना शुरू कर दिया है। इससे दो सौ से तीन सौ रुपए प्रतिदिन की आय हो जाती है। इससे गुजारा-बसर कर रहे हैं। परिवार जन सब्जी एवं खेती बाड़ी करते हैं। इससे कुछ सहारा मिल जाता है। जबकि अन्य राज्यों में होमगार्डों को स्थाई किया हुआ है, लेकिन राजस्थान में अनदेखी की जा रही है।





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