गंगापुरसिटी . उपखंड में गौमाता की भूख भामाशाहों के भरोसे ही मिटती नजर आ रही है। सरकारी भेंट इन्हें ‘राजनीति’ का हिस्सा बनने पर ही मिल पाती है। गौमाता के पालनहार भी इन्हें दुधारू रहने तक ही अपने बाड़े में जगह देते हैं। बाकी समय यह अपने हाल पर ही जीवित हैं। ‘पत्रिका’ ने 108 फुटीय श्रीहनुमानजी गौशाला दौलतपुर के हाल देखे तो यहां हालात संतोषजनक मिले।
गौशाला समिति ने यहां अपने स्तर पर अच्छे प्रबंध किए हैं और भामाशाहों को जोडक़र गौमाता का पेट भरने के लिए खासे इंतजाम किए हैं। गौशाला में सूखे चारे के पूरे प्रबंध हैं और कुछ माह के लिए स्टॉक भी है, लेकिन हरा चारा हर रोज यहां पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुंच पाता। गौशाला में 80-90 गाय एवं 20-25 बछड़े पल रहे हैं। भामाशाहों की उदारता से यहां सूखे चारे का प्रबंध सहज हो रहा है। पानी की उपलब्धता भी कुएं से हो रही है, लेकिन सरकारी सहायता यहां नहीं पहुुंच पा रही। सरकारी उदासीनता का आलम यह है कि आवारा विचरण करते गोवंश को गौशाला पहुंचाने के प्रयास नहीं हो रहे। ऐसे में शहर में भटकता गोवंश काल का ग्रास बनता है। खास बात यह है कि सडक़ों पर विचरण करने के कारण यह दुर्घटना का सबब भी बनते हैं, लेकिन इस ओर झांकने की जहमत कोई नहीं उठा रहा।
चारा डिपो की दरकार
गौशाला में काम करने वाले बच्चू सिंह बताते हैं कि बाबा बालकदास ने गौशाला निर्माण मेंं महती भूमिका निभाई। उन्होंने यहां रहकर तपस्या की और अब यहां मंदिर निर्माण का संकल्प लेकर कुंभ गए हैं। वह पिछले तीन साल से यहां नहीं हैं, लेकिन गौशाला की व्यवस्थाएं बदस्तूर जारी हैं। एक छोर पर बाबा की धूनी रमाने के स्थान पर कोठरीनुमा हॉल में भूसा रखा गया है। अन्य टिनशैड में सर्दी के मौसम में गाय बांधी जा रही हैं। यदि गौशाला में अधिक चारा पहुंचता है तो उसे रखने के लिए जगह नहीं बचती। यदि टिनशैड में उसे रखा जाए तो गायों को रहने की समस्या खड़ी हो जाती है। ऐसे में यहां चारा डिपो की महती दरकार है।
अखरती है कार्मिकों की कमी
दौलतपुर गौशाला में कार्मिकों की कमी जरूर अखरती है। यहां रह रहे करीब सौ से सवा सौ के बीच के गोवंश के चारे-पाने की व्यवस्था की जिम्मेदारी महज तीन कार्मिकों के ही भरोसे है। ऐसे में ‘सेवा’ कम खानापूर्ति ज्यादा नजर आती है। गायों को चारा खिलाने, पानी पिलाने एवं गोबर उठाने तक की जिम्मेदारी भी इन्हीं के कंधों पर है। ऐसे में कार्मिकों को इन्हें संभालना मुश्किल भरा होता है।
गोबर ही आय का जरिया
वर्तमान में गौशाला में रह रहीं गाय नाम मात्र का ही दूध दे रही हैं। ऐसे में यहां रहने वाले कार्मिक एवं आने-जाने वालों के लिए चाय का ही काम चल पाता है। ऐसे में दूध नहीं बिकने से गौशाला की आय जीरो ही है। कार्मिकों के राशन-पानी के पैसे का जुगाड़ गोबर बिकने से हो पाता है। कार्मिक गौशाला के गोबर को इकट्ठा कर लेते हैं। इसके बाद इन्हें किसानों को बेच दिया जाता है। इससे यह गौशाला की एक छोटी आमदनी का जरिया बना हुआ है।
जुड़ें लोग तो निखरे रूप
108 फुटीय श्रीहनुमानजी गौशाला करीब १५ बीघा भूमि में विकसित है। छाया का प्रबंध या तो टिनशैड हैं या फिर बबूल के पेड़। यहां लोग श्रमदान कर इसके स्वरूप को बेहतर कर सकते हैं। यहां पहुंचने वाले लोगों को पेड़-पौधों की कमी अखरती है। पानी के पर्याप्त प्रबंध होने के बाद भी यहां पौधे विकसित नहीं किए गए हैं। बारिश के मौसम में यहां पौधरोपण सहित अन्य कार्यक्रम किए जाएं तो यहां की दशा और बेहतर हो सकती है।
बामनवास में बिगड़ रही स्थिति
बामनवास में गोवंश बेहाल स्थिति में है। यहां गोवंश के लिए पर्याप्त चारे-पानी की भी व्यवस्था नहीं है। इसके चलते गोवंश दम तोड़ रहा है, लेकिन प्रशासन की खामोशी टूटने का नाम नहीं ले रही है। खासे हो-हल्ला के बाद कमेटी बनी है। वह भी भामाशाहों के ही भरोसे है। यहां चारागाह क्षेत्र में गोवंश के दर्जनों कंकाल इनकी कहानी बखूबी बयां करते नजर आए थे। भूख के चलते जहां गोवंश ने दम तोड़ा वहीं सर्दी के मौसम ने भी उनको खूब सताया है, लेकिन सरकारी राहत यहां तक नहीं पहुंच सकी।
इस मामले में 108 फुटीय श्रीहनुमानजी गौशाला दौलतपुर के कार्यकारी अध्यक्ष आशीष शर्मा का कहना है कि व्यवस्थाओं को और बेहतर बनाने के लिए प्रयास कर रहे हैं। चारा डिपो की कमी महसूस होती है। भामाशाहों को जोडक़र यहां और काम कराए जाएंगे। गौशाला में पानी भरने की समस्या रहती है। इसका निदान कराया जाएगा।





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