गिरादड़ा. सरकार की ओर से राजकीय विद्यालयों में नामांकन बढ़ाने के ढोल तो हर वर्ष बजाए जाते है, लेकिन वहां पढ़ाने के लिए शिक्षक है या नहीं। इससे कोई सरोकार नहीं है। ऐसा ही हाल दयालपुरा ग्राम पंचायत मुख्यालय स्थित राजकीय माध्यमिक प्रवेशिका संस्कृत विद्यालय का है। इस विद्यालय में पीने के पानी तक की व्यवस्था नहीं है। विद्यार्थियों को घर से बोतल भर कर पानी लाना पड़ता है। ऐसा नहीं करने वाले विद्यार्थियों को जीएलआर से पानी लाना पड़ता है। स्कूल में पोषाहार आदि पकाने के लिए भी जीएलआर से ही विद्यार्थी पानी लाते हैं।
इस विद्यालय में दस कक्षाएं होने के बावजूद महज तीन शिक्षक ही नियुक्त है। इनमें से एक प्रधानाध्यापक तो हमेशा कार्यालय के कार्य में ही व्यस्त रहते है। इस कारण दो शिक्षकों पर ही सभी कक्षाओं को पढ़ाने की जिम्मेदारी रहती है। जो पांच-पांच कक्षाओं को एक साथ बैठाकर या एक के बाद एक कक्षा में कार्य देते हुए पढ़ा रहे हैं। जबकि इस स्कूल में 58 विद्यार्थी है। जिनमें से 38 तो बालिकाएं ही है।
स्कूल की चार दीवारी छोटी
इस स्कूल की चार दीवारी छोटी है। इस कारण स्कूल के बाहर के रास्ते से गुजरते वाहनों और ग्रामीणों के कारण पढ़ाई में व्यवधान आता है। स्कूल का तल नीचा होने के कारण बारिश के पानी का भराव भी होता है। विद्यालय के कमरों की छत भी टपकती है।
जीएलआर से लाते हैं पानी
स्कूल में पानी नहीं आता है। इस कारण जीएलआर या घर से पीने का पानी लाना पड़ता है। घर से लाई बोतल में गर्मी के समय पानी खत्म होने पर प्यासे बैठे रहना पड़ता है।
वर्षा पटेल छात्रा
विद्यालय में भरता पानी
स्कूल में शिक्षको की कमी हे। बरसात के समय पानी का भराव रहता है। इस कारण परेशानी का सामना करना पड़ता है। इसके बावजूद कोई ध्यान नहीं दिया जाता है।
दीपिका गोयल छात्रा
उपेक्षा का शिकार
संस्कृत स्कूल उपेक्षा का शिकार है। हमने कई बार विद्यालय की समस्याओं को अधिकारियों के साथ जनप्रतिनिधियों को बताया। इसके बावजूद हल नहीं निकला।
जीवाराम पटेल, ग्रामीण
अधिकारियों को बताया
मैंने कई बार अधिकारियों व जनप्रतिनिधियो से मौखिक व लिखित में स्कूल की असुविधाओं के बारे में बताया है। हम अपनी तरफ से पूरा प्रयास कर रहे है।
पप्पूराम, प्रधानाचार्य





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