देश की सबसे पुरानी कांग्रेस पार्टी ने चुनावों के लिए कमर कस ली है। राजनीति में प्रियंका गांधी वाड्रा की नई भूमिका ने राजनीतिक दलों की बेचैनी बढ़ा दी है। तीन राज्यों में भाजपा की हार ने कांग्रेस को जमीनी स्तर पर मजबूत किया है जिससे उसकी उम्मीदें और बढ़ गई हैं। राजनीति में प्रियंका के आने को लेकर काफी लंबे समय से कयास लगाए जा रहे थे, हालांकि इससे पहले भी वे राहुल गांधी और सोनिया गांधी के चुनाव प्रचार में शामिल होती रही हैं। वे एक तेजतर्रार और अच्छी वक्ता हैं जिनकी तुलना देश की पहली महिला प्रधानमंत्री और उनकी दादी इंदिरा गांधी से की जाती है। इंदिरा गांधी ने 1966 से 1977 और उसके बाद 1980 से 1984 तक देश पर राज किया था।
प्रियंका को पार्टी ने पूर्वी उत्तर प्रदेश की कमान दी है जहां 20 करोड़ से अधिक की आबादी अपने मताधिकार के प्रयोग से देश की सियासत बदलने का दमखम रखती है। 2014 के आम चुनावों में मोदी की प्रचंड जीत का रास्ता भी यहीं से खुला था। लेखक राशिद किदवई जो राजनीतिक विश्लेषक हैं और सोनिया गांधी की आत्मकथा ‘प्रियंका इटैलियन बॉर्न मदर’ लिखी है, वे कहते हैं कि प्रियंका पार्टी के लिए गेमचेंजर की भूमिका निभा सकती हैं। वे एक सधी हुई राजनेता हैं। 2009 के आम चुनावों के प्रचार के दौरान मोदी ने कहा था कि कांग्रेस ‘बूढ़ी पार्टी’ है इसपर प्रियंका ने पलटवार करते हुए कहा था कि क्या मैं बूढ़ी दिखती हूं। उन्हें बखूबी पता है कि जनता क्या चाहती है। प्रियंका पार्टी की मजबूती के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाएंगी और वही मोदी को कड़ी टक्कर दे सकती हैं।
जोआना स्लेटर, वाशिंगटन पोस्ट की भारत में ब्यूरो चीफ हैं, वाशिंगटन पोस्ट से विशेष अनुबंध के तहत





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