आबूरोड. भाखर क्षेत्र में खेती के दौरान फसल को पानी देने का कोई साधन नहीं होने पर आदिवासियों ने सारण बनाकर खेतों को हरा भरा बनाने का उपाय निकाला। जिसमें भाखर क्षेत्र काफी हैक्टेयर में खड़ी फसलों की पिलाई इसी तकनीक से की जा रही थी, लेकिन काफी समय से जिले में इन्द्रदेव की मेहरबानी नहीं होने के कारण अब यह सारण सूखी पड़ी है, ऐसे में ग्रामीणों को काफी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। सारण बंद होने के कारण किसानों को महंगे दामों से पाइप तथा मशीन की खरीदारी करनी पड़ती, जो इनकी खरीदारी नहीं कर सकता है, उसने तो करीब करीब खेती का काम बंद कर दिया है।
पहाड़ के किनारे बनती है सारण
आदिवासी बहुल भाखर क्षेत्र में ज्यादातर स्थानों पर सारण बनाई गई है, यह कुई सांगणा, निचलागढ़, निचली बोर, निचला खेजड़ा समेत अन्य गावों में बारिश के समय पहाड़ों तथा नदी के जिस स्थान से तेज वेग से पानी बहता है, उस स्थान पर बहते पानी के बराबर सामुहिक छोटी नहर (सारण) बनाई जाती है, जिससे एक छोर से अंतिम छोर तक स्पिड़ से पानी जाता है, यह पहाड़ी पर उलटा भी चढ़ाया जाता था।
बारी बारी से उपयोग होता है पानी
उपलागढ़ के भोमाराम ने बताया कि पानी बारिश के समय में नदी नालों में लगातार पानी चलने के दौरान पानी के एक भाग पर पत्थर व झाडिय़ा रखकर उसका रूख सारण की ओर कर देते है, जिससे खेतों की ओर पानी पहुंचता है, जिस जिस किसान को खेतों में पानी देना है, वो समय के अनुसार सारण से पानी को खेत की ओर मोड़ देते है। जिससे फसल को नियमित पानी भी मिलता रहता है।
खजूर की नाली
रामाराम गरासिया ने बताया कि कई स्थानों पर पानी को डालने के लिए खजूर के पेड़ को सूखाकर उसको नाली के रूप में काम लेते है, क्योंकि खजूर का पेड़ दोनों छोर से आर-पार होने के कारण इसमें बिना रूकावट के पानी एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंच जाता है।





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