झुंझुनूं. कालबेलिया समाज में लड़कियों को कोई खास तवज्जो नहीं दी जाती थी, धनतेरस के दिन मेरा जन्म हुआ तो मुझे जमीन में गाड़ दिया था।मेरी मौसी ने मुझे निकाला तो मेरी सांसे चल रही थी।पिता उस दिन बाहर गए थे, पता चला तो काफी नाराज हुए।आज कला के दम पर165 से अधिक देशों में प्रस्तुति दे चुकी हूं।अगर बेटियों को भी सम्बल दिया जाए तो बेटों से ज्यादा मां-बाप का नाम कर सकती है, इसका मैं जीती-जागती उदाहरण हूं।यह कहना था कालबेलिया नृत्य की बदौलत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति बटोरने वाली व पदमश्री से सम्मानित नृत्यांगना गुलाबो का। यह बात उन्होंने झुंझुनूं में कार्यक्रम में प्रस्तुति देने से पहले पत्रिका से कही।
सवाल- बचपन काफी संघर्षों में बीता, कभी सोचा कि सफर को रोक दें?
गुलाबो- जीवन में काफी परेशानियां आई, लेकिन उन्हें मैंने अपनी ताकत बनाते हुए सफर को जारी रखा।विश्वास था कि एक दिन अच्छे दिन जरूर आएंगे।मेहनत का सम्मान मिला।
सवाल- यादगार स्टेज शो?
गुलाबो- १९८५ में पुष्कर में मेरी जिन्दगी का पहला स्टेज शो था। इसके बाद १४ साल की उम्र में अमेरिका में स्टेज शो था।लेकिन एक दिन पहले पिता की मौत हो गई।लेकिन पिता की इच्छा का सम्मान करते हुए गई। रोज आठ घंटे डांस करती, खाली समय होता बाथरूम में जाकर पिता को याद कर बहुत रोया करती थी। पिता आज भी मुझमें जिन्दा हैं।दोनों शो मेरे लिए अविस्मरणीय हैं।
सवाल- समय में बदलाव आया है, पाश्चात्य संस्कृति हावी हो रही है?
गुलाबो- ये बात सही है कि फोक डांसरों को जितना प्रोत्साहन मिलना चाहिए, वैसा नहीं हो पा रहा है।लेकिन मैं उन्हें अपने संघर्ष की कहानी सुनाकर प्रोत्साहित करती हूं। कला को जिन्दा रखने के लिए सरकार को मंच देने की आवश्यकता है।
सवाल- सांप जैसे लहराते है वैसे स्टेज पर आप लहराती है, इसके लिए प्रशिक्षण लिया?
गुलाबो- कला हमारे खून में ही शामिल है, बचपन में सांपों को देखकर मैंने इस कला सीखी।माता-पिता ने आगे बढऩे में हौसला दिया।
सवाल- कला को जीवित रखने के लिए क्या प्रयास कर रही हैं?
गुलाबो- इसके लिए पुष्कर में स्कूल खोला है, जो कि बनकर तैयार हो चुका है।यहां पर युवक-युवतियों को प्रशिक्षण देंगे।मेरे इच्छा है कि घर-घर में गुलाबो हो।मेरी बेटी व बेटा व इसको आगे बढ़ाने में मेरा सहयोग कर रहे हैं।





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