जैसलमेर. रियासतकाल में बनाए गए और आजादी के बाद नेहरू पार्क के नाम से पहचान रखने वाले जैसलमेर के सबसे बेहतरीन स्थान पर आए बगीचे को मौजूदा नगरपरिषद बोर्ड चार साल से अधिक के कार्यकाल में भी विकसित नहीं कर पाया। जबकि इसकी सूरत को संवारने के लिए शुरुआत से खूब दावे किए गए लेकिन यह कुल मिलाकर जुबानी जमाखर्च ही साबित हुआ। लोकसभा चुनाव की घोषणा से पहले नगरपरिषद की बजट बैठक में एक बार फिर नेहरू पार्क की दशा और दिशा संवारने के लिए करीब तीन करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया। लेकिन नगरपरिषद की लेटलतीफी के कारण यह प्रावधान भी चुनाव आचार संहिता की भेंट चढ़ता प्रतीत हो रहा है। इस बीच गर्मी का मौसम शुरू हो चुका है और शहरवासियों के साथ ही लाखों की संख्या में जैसलमेर घूमने आने वाले देशी-विदेशी सैलानियों को सुकून के पल बिताने की यहां कोई व्यवस्था नहीं हो सकी।
डीपीआर से आगे नहीं बढ़ता काम
जैसलमेर के सबसे प्रमुख स्थान हनुमान चौराहा पर अवस्थित नेहरू पार्क में बच्चों के लिए टॉय ट्रेन, रंगीन फव्वारे, सघन हरियाली की चादर बिछाने से लेकर अन्य कई किस्म की सुविधाएं मुहैया करवाने को लेकर नगरपरिषद एक बार फिर विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) बना चुका है। इसके आधार पर कोई तीन करोड़ रुपए की लागत के कार्य यहां करवाए जाने है। जानकारी के अनुसार इस कार्य को मंजूरी के लिए स्वायत्त शासन विभाग, जयपुर को भेजा गया है। जयपुर से हरी झंडी मिलने के बाद ही टेंडर और कार्यादेश जारी हो सकते हैं। जो चुनाव की आचार संहिता के चलते आगामी करीब दो माह तक संभव नहीं है। ऐसे में एक बार फिर गर्मी के मौसम में शहरवासियों को इस विकसित पार्क की सौगात मिलना संभव नहीं रह गया है। गौरतलब है कि नेहरू पार्क की किस्मत संवारने के लिए पूर्व में भी डीपीआर बनाने तक की कवायद की जा चुकी है।
यह है हकीकत
इधर नेहरू पार्क पिछले लम्बे अर्से से पूरी तरह से उजाड़ बना हुआ है और यहां हनुमान चौराहा क्षेत्र के दुकानदारों, ठेले वालों व अन्य लोगों की ओर से कूड़ा स्थल ही बना दिया गया है। किसी समय यहां नगरपरिषद ने टॉय ट्रेन का संचालन करने और हरियाली बिछाने आदि पर 50 लाख रुपए खर्च करने की योजना तैयार की थी। लेकिन यहां न टॉय ट्रेन पहुंची और न हरियाली बिछी। समय-समय पर पार्क में लाखों रुपए के विकास कार्य भी करवाए गए, उनके अब अवशेष तक नजर नहीं आते। आलम यह है कि नेहरू पार्क अब नाममात्र के लिए भी पार्क नहीं रह गया है। पार्क का बड़ा हिस्सा वाहनों की पार्किंग के काम आता है तो यहां शायद सबसे ज्यादा कूड़ा-करकट और खाद्य सामग्री की अपशिष्ट सामग्री डाली जाती है।
पार्क में हो रही पार्किंग?
गत अर्से के दौरान जैसलमेर के इस सबसे पुराने उद्यान के एक हिस्से में वाहनों की पार्किंग बना दी गई है। जहां दिन भर १०-२० चार पहिया वाहन खड़े रहते हैं। हनुमान चौराहा से पार्क के अग्रभाग से पिछवाड़े तक जाने के लिए आर-पार रास्ता बनाया जा चुका है। इससे पार्क का क्षेत्रफल सिकुड़ गया है। रियासतकाल से पार्क के लिए निर्धारित इस क्षेत्र में कोई व्यक्ति खड़ा होकर वर्तमान में पल-दो पल के लिए चैन की सांस तक नहीं ले सकता। खाने-पीने की वस्तुओं के अपशिष्ट सड़ांध मारते हैं और उन पर गोवंश, सूअर, श्वान आदि मंडराते हैं। पार्क स्थल की दीवारें व कोने, लघुशंका समाधान के लिए काम आते हैं। इस पार्कस्थल को कुछ लोग शहर का सबसे बड़ा कूड़ाघर भी कहने लगे हैं। रात के समय बरसों से यह जगह शराबखोरी के काम में आ रही है। पार्क के विकास, सौन्दर्यीकरण और जन-सुविधाओं की उपलब्धता के नाम पर स्थानीय निकाय ५० लाख रुपए से ज्यादा की राशि खर्च कर चुका है। लेकिन आज वहां फव्वारे की घुमटी शेष बची है। पाथ वे तक जगह-जगह से उखड़ गया है। दूब का तिनका तक नजर नहीं आता और लोगों के बैठने के लिए रखवाए गए पत्थर के सोफे गायब हो गए। चारदीवारी भी जगह-जगह से क्षतिग्रस्त हो चुकी है।
फैक्ट फाइल -
- 50 लाख से ज्यादा अब तक पार्क पर खर्च
- ०८ लाख पर्यटक हर साल आते हैं जैसलमेर
- ०३ करोड़ के कार्य करवाने अब भी प्रस्तावित





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