पाली। पट्टाशुदा भूखण्ड दिलाकर उस पर ऋण लेकर मकान बनाकर देने का झांसा देने वाले एक शातिर युवक ने करीब पौने दो करोड़ की ठगी की। गरीबों ने बड़ी उम्मीद के साथ करीब दस दिन पहले पुलिस अधीक्षक आनंद शर्मा से मिलकर गुहार की और व्यथा बताई। पुलिस अधीक्षक ने जांच कोतवाली पुलिस को सौंपी, लेकिन जांच के नाम पर पुलिस अब इन गरीब पीडि़तों को चक्कर कटवाकर परेशान कर रही है। कोतवाली पुलिस पीडि़तों का मामला तक दर्ज करने से बच रही है। अब पीडि़त परेशान होकर पुलिस पर दबाव का आरोप लगा रहे हैं।
तीन और पीडि़त आए सामने, पुलिस को दर्द नहीं ठगी का शिकार होने वाले तीन और पीडि़त सामने आए हैं। उन्होंने बताया कि बैंकों से ऋण दिलाकर मकान बनाने का झांसा देकर शातिर एजेंट ऋण की राशि लेकर फरार हो गया। बैंक से बकाया राशि का नोटिस मिला तो उन्हें जानकारी मिली।
पीडि़तों के आंसू
रोहट निवासी सुरेन्द्र ने बताया कि एक दोस्त के जरिए भरत से मिला था। भरत ने झांसा देकर दस्तावेज लेकर फाइल बना दी। हस्ताक्षर किए हुए चेक ले लिए फिर ऋण की सारी राशि निकाल ली और मकान बनाकर भी नहीं दिया। अब बैंक से नोटिस आया। बैंक की ओर से पहली किस्त ७ लाख १९ सितम्बर २०१६ को जारी हुई। जो उसी दिन निकाल लिए। उसके बाद समय-समय पर चेक के जरिए बैंक से किस्त निकालता रहा।
यह होता है एफआईआर का मतलब
एफआईआर का मतलब होता है (प्रथम सूचना रिपोर्ट)। यानि कोई भी पीडि़त रिपोर्ट दर्ज करवाने आता है तो पुलिस को उसकी पहले रिपोर्ट दर्ज करनी होती है। रिपोर्ट में जिसको आरोपी बनाया है या जो आरोप लगाया है वे कितने सच है और कितने झूठे हैं। इसको लेकर अनुसंधान किया जाना चाहिए। मामला झूठा पाए जाने पर पुलिस न्यायालय में एफआर (अंतिम रिपोर्ट) पेश कर सकती है। रिपोर्ट झूठी पाए जाने पर परिवादी के खिलाफ आईपीसी की धारा-१८२ के तहत के कार्रवाई कर मामला तक दर्ज किया जा सकता है। ठगी का जो मामला हैं जो संज्ञे अपराध की श्रेणी में आता है। इसमें पुलिस को तुरंत प्रकरण दर्जकर अनुसंधान करना होता है। इसके संबंध में समय-समय पर माननीय उच्च न्यायालय व सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्देश दिए जा चुके हैं।
यह भी ठगी का शिकार
सुभाष नगर निवासी मनोहरसिंह ने बताया कि मकान बनाकर देने का झांसा दिया और उससे दस्तावेजों के आधार पर बैंक में ऋण फाइल लगाई। बैंक से तीन लाख रुपए की पहली किस्त २६ जुलाई २०१६ को जारी हुई, जो उसी दिन भरत ने निकाल ली। २७ जुलाई २०१६ को बैंक ने ७.५ लाख रुपए जमा करवाए वह भी उसने निकाल लिए। लेकिन जितनी राशि निकाली उतना मकान बना नहीं। इस पर तीन मार्च २०१७ को खाते में आई ४.५ लाख की किस्त उसे नहीं उठाने दी।
जांच तो मुकदमा दर्ज करके भी हो सकती है
करीब दस दिन पूर्व शहर के १२-१३ जनों ने पुलिस को ज्ञापन सौंपा था। इसमें आरोप लगाया था कि राजेन्द्र नगर निवासी भरत नाम के युवक ने उन्हें ११ लाख रुपए में मकान बनाकर देने का झांसा दिया और उनकी ऋण फाइल बनाकर पीसीसीबी बैंक से ऋण स्वीकृत करवाया। उनसे हस्ताक्षर करवाकर खाली चेक लिए। आरोप है कि बैंक मैनेजर से मिलीभगत कर ऋण की सारी राशि निकाल ली और मकान बनाकर भी नहीं दिया। बकाया राशि का नोटिस बैंक से पहुंचा तो उन्हें इसकी जानकारी मिली। अब पीडि़तों का कहना है कि पुलिस जांच का बहाना बना रही है, जबकि यह जांच तो मुकदमा दर्ज होने के बाद भी हो सकती है।
१५ लाख का ऋण, पहली किस्त १०.५० लाख की
रोहट निवासी पीडि़त हेमराज गर्ग ने बताया कि वह भरत के पास ही काम करता था। उसे भी भरत से झांसा देकर ऋण दिलाया। ऋण राशि हड़प ली, लेकिन मकान बना ही नहीं। बैंक से बकाया राशि का नोटिस मिला तो होश उड़ गए। ऋण खाते से रुपए निकाले जाने का विवरण देखा तो सामने आया कि बैंक ने १५ लाख रुपए के ऋण में से १०.५० लाख की राशि पहली किस्त के रूप में ४ नवम्बर २०१६ को बैंक में जमा करवाई और उसी दिन यह राशि निकाल कर ले ली। और फिर ६ दिसम्बर २०१६ को १.९० लाख, ३० दिसम्बर २०१६ को दो लाख रुपए और निकाले।





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