जालोर. अब तक केवल शराब तस्करी के गढ़ के रूप में ही जालोर जिला पहचाना जा रहा था, लेकिन बुधवार को बागरा थाना क्षेत्र अंतर्गत देवाड़ा गांव में तीन अलग अगल खेत में डोडा की खेती मिलने पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि केवल नशे की तस्करी ही नहीं, बल्कि नशे की पैदावार भी जालोर जिले में अब होने लगी है। हालांकि यह पहला मौका है जब जालोर जिले में किसी खेत से डोडा की अवैध बुवाई पकड़ी गई है। लेकिन उसके बाद भी यह चौंकाने वाला मामला होने के साथ साथ पुलिस के लिए भी जांच का विषय है कि इन खेतों पर पहली बार ही डोडा की खेती की गई है या पूर्व में भी हुई है और खेती के बाद इस अवैध पैदावार को कहां पहुंचाया जाना था। यदि पहले भी यहां पैदावार हुई है तो वह कितनी हुई और उसे कहां कहां पहुंचाया गया।
कहां पहुंचाया जाना था यह जानना जरुरी
यहां डोडा की फसल की बवाई के पीछे क्या मंशा है और इसकी बिकवाली कहां होनी थी। इसकी जांच पुलिस कर रही है। लेकिन जालोर जिले के लिए एक घटनाक्रम कई मायने में महत्वपूर्ण और तस्कर गिरोह के बड़े जाल की तरफ भी इशारा कर रहे हैं।
सरकारी स्तर पर नशे के रूप में डोडा पर रोक
डोडा और अफीम के कारोबार पर सरकारी रोक है और करीब 2 साल पूर्व डोडा की ठेका प्रणाली भी बंद की जा चुकी है। सरकारी स्तर पर वर्तमान में राजस्थान में मुख्य रूप से चितौड़, कोटा, बारा, झालावाड़ में आरी (पट्टे) जारी है। यहां से डोडा से दूध निकालने के बाद सूखे डोडे को नष्ट करने का प्रावधान है। वहीं अफीम का दूध सरकार अपने कब्जे में ले लेती है और उसके बाद परमिट अनुसार मेडिकल और परमिट धारी कंपनियों को जारी करती है। वहीं डोडा के चूरे या पाउडर और अफीम की बिना परमिट के खेती पूरी तरह से प्रतिबंधित है।
इसलिए खतरे का संकेत
हालांकि पहला मौका है जब जालोर में डोडा की खेती पकड़ी गई है, लेकिन यह मामला चिंता का विषय जरुर है। क्योंकि जालोर जिले में डोडा और अफीम के बंधाणी अधिक है और सीधे तौर पर डोडा से ही अफीम का दूध भी निकलता है और डोडा सूखने के बाद इसे भी नशे के लिए काम में लिया जाता है। जालोर-बाड़मेर जिले की बात करें तो हर सामाजिक और पारिवारिक कार्यक्रमों में भी इसका उपयोग होता है।





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